ग्रथम संस्करण ३९४० ई०

मुल्य दो रुपये

शोल एजेल्ट-- विद्याभास्कर चुकडियो, ज्ञानवापी, बताएल

१---दो बातें २--आरम्भिक प्रवेश ३--शअसाद का जीवन ४-- भ्रसाद के उपन्यास ७५--असाद कौ कहानियाँ ६--प्रसाद के नाटक ७--पभ्रसाद के निवन्ध ८--भाषा और शैली ९--रहस्यवाद १०--प्रसाद्‌ का काव्य

क्रम

3७-१० ११-१६ १७-४१

४२-११९ १९२०-१४७ १४८-१७४ १७५-१७९ १८०-१८८ १८९-२०० २०१-२७२

पिय प्रसाद जी के अससय स्वगवास के उप- रान्त कई बार उनके विषय में कुछ संस्मरण लिखने का इरादा हुआ ; पर जब जब लिखने बैठा, तब तब उस समय की प्रसाद-सम्बन्धी अनुभूतियों ने स्थृति-पट पर अकट होकर सुझे इतना अभिभूत कर दिया कि छेखनी जहाँ की तहाँ रख दी ओर उसी महापुरुष की स्वरृति में तड्लीन हो गया। आज ख्नेहभाजन मित्र विनोद्शझ्कर व्यास के अनुरोध से प्रसाद जी पर फिर छुछ पंक्तियों लिखने बैठा हूँ इस समय भी वही दशा है वास्तव सें साहित्यिक प्रसाद की अपेक्षा में तो मनुष्य प्रसाद को दी महतोमहीयान मानता हैं साहित्यिक प्रसाद का परिचय तो अलेक छोग उसके साहित्य से प्राप्त कर चुके हैं. और आप्त करते रहेंगे किन्तु मनुष्य प्रसाद का परिचय तो अच्छी तरह वे ही आप्त कर सके हैं, जो उनके सम्प्क में रहे हैं। बा०

जयशंकर प्रसाद फेवछ कवि ही थे; वह एक उदार और सहदय व्यक्ति थे। में इसी माने में उनकी महापुरुष मानता हूँ मेरा और उनका साथ छगभग ५-६ चर्ष तक बराबर नित्य १८ से २० घंटे तक रहा। इस छंबे अवसर में उनमें अनेक विशेषताएँ मैंने पाई, जिनका पूरा विवरण देने के लिए १००-७० प्रष्ठ भी यथेष्ट होंगे।

पहली और सब से बड़ी विशेषता उनमें यह देखी कि वह अत्येक सहृदय साहित्यिक के साथ असाधारण प्रेम का व्यवहार करते थे। आजकल के अनेक लेखकों की तरह वह किसी प्रतिस्पर्द्धी से ईषो रखते थे। उन्होने क्रमी किसी की निन्‍्दा नहीं की उनके मुख से मैंने उस मनुष्य के प्रति भी कभी कोई बुरा सन्तव्य नहीं सुना, जो उन्हें घुरा कहता था या उनकी भ्रतिभा का कायछ था। श्रसाद जी यथाशक्ति प्रत्येक साहित्यिक का सम्मान और सहायता करते थे। दूसरी विशेषता यह उनमें थी कि मेंने कभी उनको क्रोधित होते नहीं देखा यहाँ तक कि उनके एक बंगाली नौकर के कारण यथेष्ट आर्थिक हानि उठानी पड़ी; परन्तु उन्होंने उसके लिए भी कभी

ऋद्टक्ति नहीं की | तीसरी विशेषता यह पाई कि उनमें अभिमान नहीं था आज के जाने में ऐसी अकृति दुलेभ ही है। जब प्रसाद जी के भांजे बा० अम्बिकाप्रसाद गुप्त ने, उन्हीं की अजुमति से इन्दु नाम का सासिक थत्र निकाछा था, उसी बीच मेरा और प्रसाद जी का प्रथम परिचय हुआ बह अपने बैठके में बैठे तेछ की मालिश करा रहे थे | में अपरिचित था। शायद उन्होंने मेरा नाम सुन रक्खा था। नाम सुनते ही डठकर गले से छगा छिया और सादर अपने पास 'बिठाया कुछ साहित्यिक बातौछाप हुआ | उन्होंने इन्दु का संपादन मुझे सौंपने की इच्छा प्रकट की मैंने भी उनके साहचये छाभ के छोभ से उसे स्वीकार कर लिया। उसी दिन से मे उनका अंतरंग मित्र बस गया और जीवन भर वह मुझे उसी तरह मानते रहे अन्तिम दिनों में अ्रसाद जी नुमाइश के अवसर पर पुत्र सहित छूखनऊ गये थे। छखनऊ पहुँचते ही “चह मेरे घर पर गये। ठुरभाग्यवश उस दिन भेंट हो सकी वह फिर माधुरी आफिस में मिलने गये और

३-४ घंटे तक मेरे पास बैठे बातचीत करते रहे। वही मेरी और उनकी अन्तिस सेंट थी। आज भी उनकी वह मूर्ति मेरी आँखों के आगे है। मूलती नहीं मेरा खयाल है, प्रसाद जी एक विभूति थे उन्होने अपनी रचनाओं से हिन्दी के भंडार को समृद्ध बनाया है। जब तक उनकी ये ऋृतियाँ हैं, तब तक वह अमर हैं। प्रिय सित्र पं० विनोदशक्ुर जी उनके अन्तरंग और घनिष्ठ मित्र थे। व्यास जी ने यह पुस्तक लिख कर प्रशंसनीय काय किया है असाद जी पर व्यास जी की यह पुस्तक सर्वागपूण और प्रामा- णिक है। आशा है, इसका प्रचार और आदर यथेष्ट होगा और व्यास जी का परिश्रम सार्थक होगा। लीडर प्रेस वालों से मेरा यह अनुरोध है कि संपूर्ण प्रसाद-प्रन्थावछी का सटीक सुसम्पादित सुन्द्र सस्ता संस्करण निकालने का अवश्य आयोजन करें | प्रसाद जी की रचनाओं को घर-घर पहुँचाना ही उनका छक्ष्य होना चाहिए, टके कमाना नहीं रूपनारायण पाण्डेय,. ( माधुरी-सम्पादक )

यह सत्य है, यदि आधुनिक हिन्दी साहित्य से प्रेमचन्द्‌ और प्रसाद की समस्त रचनाएँ

हंटा दी जायें तो उससे कुछ नहीं रह जायगा। प्रसाद ' नें साहित्य के समस्त अंग नवीनता के ठोस सांचे में ढाछा है। प्रेमचन्द जी ने कथा-साहित्य को जीवन दिया है। दोनों ही लेखकों की छेखनी के सम्मुख्य हम नत मस्तक हैं, उनके चरित्र और जीवन का जो अध्ययन करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था, उससे आज तक जो अधिक उज्ज्वल रह सकी हैं, वह दोनो की हंसी थी प्रसाद प्रायः मुस्कराते थे और कभी कभी उनकी बड़ी सुन्दर हंसी खिल उठती थी प्रेम- चन्द जी भी बड़ी सरल हँसी हँसते थे। दोनो महार- थियो की वह हँसती हुई आकृति अब भी स्वप्न चित्र की तरह आंखों के सम्मुख आकर खड़ी हो जाती है

दूसरी ओर जब महाश्मशान पर इस नश्वर तन का घुआंधार अन्त, अन्त में दिखछा कर संकेत करता है कि जीवन का मूल्य एक बार खिलखिला कर हँस देना है। कभी सुख, कभी दुःख सुख-दुःख की यह जटिल पहेली कभी सुलझी है और सुल्झेगी दाशेनिक और बिठ्ानो की यह खुराक आलू की तरकारी की तरह भिन्न-भिन्न रूप और आवरण मे तक की थाली मे अस्तुत हुईं है कहना होगा कि इसी सुख-हुःख की गाथा द्वी से विश्व- साहित्य का निमोण होता है

इंगलेण्ड के सम्मानित उपन्यास छेखक आतोल्ड चैनेट ने साहित्य की विवेचना करते हुए लिखा है कि चाल्स लेम्ब अपने भाई की झत्यु के बाद यह सोचता था--यह्‌ सुन्द्र हे। दुःख सुन्दर है, निराशा और जीवन दोनों ही सुन्दर है। में उनसे अवश्य कहूँगा और उन्हे यह समझाऊंगा ।!

प्रसाद की बचपन से ही काव्य को ओर रुचि थीं। इसलिए पहले वह कवि हुए, फिर नाटककार, कहानी और उपन्यास छेखक और अन्त से निबन्ध

हल

लेखक इस तरह प्रसाद ने साहित्य का जो ढांचा तैयार किया था, वह उनके जीवन में ही पूर्ण हुआ अन्तिम समय में उन्हें जो सब से बड़ा सन्‍्तोष और शान्ति थी, वह इसी बात की कि उनका साहित्यिक कार्य क्रम पूरा हुआ था हाँ, एक रहस्य यहां खोल देना आवश्यक प्रतीत होता हे। यह एक श्श्न उपस्थित होता है कि प्रसाद ने जब सब अंगों की पूर्ति की तो गद्यकाव्य की उनकी कोई पुस्तक क्‍यों नहीं प्रका- हित हुई ? इसके उत्तर में श्री राय कृष्णदास के अतीत शीषक लेख का यह अंश यहां देना अनुचित होगा।

(इन्हीं दिनों जयशंकर जी ने भी पहिले पहल साधना को देखा उन्होंने भी उसे बहुत पसन्द किया केवल जबानी ही नहीं | एक द्नि आये, सुदामा की तरह कुछ छिपाये हुए | उसे बहुत छीना झपटी और हॉ-नहीं के बाद बड़े हाव भाव से उन्होंने दिखाया उन दिनों उनकी ऐसी ही आदत थी कि अपनी रचनाएँ दिखाने में बड़ा तंग करते थे वह एक साफ सुथरी छोटी सी कापी थी, जिसमें बीस' के छगभग गद्य गीत उनके लिखे हुए थे मैंने कइयो'

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को झांका सुन्दर थे एक में का सन्ध्या वर्णन अभो तक नहीं भूछा। किन्तु मैं उन दिनों बावछा हो रहा था। मुझे अपनी शेली पर इतना ममत्व और आग्रह... था कि जरा भी उदार नहीं होना चाहता था। मैने छूठते ही कहा--'क्यों गुरु छुझी पर हाथ फेरना ।' ये भेरी संकीणता पहचान गये कई द्नि बाद कोई गुनासिब बात कहकर उसे उठा ले गये और छत्त भावों में से कतिपय को छन्द्बद्ध कर डाछा उनके झरना के प्रथम संस्करण का अधिकांश उन्हीं कबि- ताओं का संकलन है ।'

इस अंश से प्रसाद का व्यक्तित्व कितना उज्ज्वल और त्यागमय प्रकट होता है, यह किसी से छिपा रहेगा

इस पुस्तक को उपस्थित्त करते हुए मुझे आज सुख और दुःख दोनों ही हो रहा है सुख इसलिये कि वर्षों से अपने इस विचार को कार्य रूप में परिणत कर सका था अब उसे पूरा करते हुए वास्तविक सुख का अनुभव कर रहा हूँ, और दुःख इस लिए कि प्रसाद जी के सामने यह पुस्तक नहीं तैयार

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हो सकी, नहीं तो इसकी ज्ुटियाँ और अपूर्णता पर सन्देह रहता

१४ वर्ष प्रसाद जी के साथ रहकर एक छात्र के रूप में जो कुछ मेने उनसे पाया, उसी के बल 'पर इस पुस्तक को प्रस्तुत कर सका हैँ

इस पुस्तक के समाप्त करने से मुझे सब से बड़ी कठिनाई यही रही कि कहानी-उपन्यास को छोड़ कर अन्य सभी विषयों से में प्रायः उदासोन ही रहा | प्रसाद जी साहित्य सृष्टा थे बहुधा वह मुझे नाटक और काव्य की ओर आकर्षित करते रहे; लेकिन मे कहानी-उपन्यास के क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ सका मेरा यह तक था कि पहले में इनका ही अध्ययन पूर्ण कर रू, तब दूसरी ओर साहस करू उनके चले जाने पर अब तो सदेव के लिए यह श्रश्न सूखे हुए पुष्प की तरह पड़ा रहेगा

काव्यवाला अंश निराला जी ने लिखना स्वीकार किया था; किन्तु अस्वस्थता के कारण लिख सके बाध्य होकर मुझे ही उसका ढाँचा बनाना 'पड़ा कबि तो नहीं हुआ; किन्तु काव्य की आत्मा

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से कुछ स्लेह सा है। प्रसाद जब अपनी कविताएँ गुनगुनाते थे तो जैसे आनन्दमय लोक में वेदना कीः एक हलकी छाया छिप जाती थी काव्य की ध्वनि और उनका वह स्वर कानों में भर जाता था आज मैं अपने जीवन के निरस दिलों में उन्हें गुनगुनाकर स्वृति की रेखाएँ बटोरता हूँ

इस अंश में जितनी कविताएं संमहीत हैं, उनमें अधिकांश वे ही हैं, जो प्रायः वह सब को सुनाते थे। पं० केशवग्नसाद जी मिश्र के आदेश और पँं० पद्म- नारायण आचाय की सहायता से लेख अधूरा नही प्रतीत होता

नाटकों का कथाभाग में बना चुका था। भूमिका के रूप से ५-६ प्रष्टठ पं० रामविकास शर्मो और श्री० ज्ञानचन्द्‌ का लिखा है। दूसरे संस्करण से इस अधिक उछुन्दर बनाने का प्रयत्न करूँगा

मकर-संक्राति, १९९ छं० मर सानसन्दिर,काशी। | विनोदशंकर व्यास |

प्रसाद जी के पितामह बाबू शिवरत्न साहु बड़े दानी और उदार पुरुष थे वह कान्यकुब्ज वैश्य जाति के थे, और सुंघनी साहु के नाम से विख्यात थे। प्रातःकाल गंगा स्नान से छौटते समय वह अपना कम्बल और छोटा तक दे डालते थे वह गुप्त रूप से विद्यार्थियों, दीन-दुखियों और ज्ाह्मणों की बढ़ी सहायता करते थे ।' यह बात प्रसिद्ध थी कि उनके द्वार से कोई खाली हाथ नहीं छौटता उन्होंने पहली बार सुर्ती गोली का अन्वेषण किया था और उन्हीं की आविष्कार की हुईं यह पान में खाने वाली सुर्ती गोी काशी की एक निजी चीज़ है। प्रसाद जी के पिता बाबू देवी प्रसाद जी भी व्यवसाय-कुशल ओर उदार थे। उस समय बाहर से आने वाले कवि, माट, बाजीगर, और विद्वान सभी काशीराज के द्रबार से छौट कर इनके यहाँ अवश्य आते थे। काशी में दो ही स्थानों में गुणियो ब्‌

प्रसाद और उनका साहित्य

का आदर था, एक काशी नरेश के यहाँ और दूसरे सुंघनी साहु के यहाँ यही कारण था कि काशी नरेश के अभिवादन में छोग महादेव कहा करते थे और सुंधनी साहु के लिए भी वही सम्मान सूचक महादेव का अभिवादन होता था मेने प्रसाद जी के साथ देखा है, बहुधा उन्हें छोग महादेव कह कर सम्मान प्रकट करते थे। काशी में यह सम्मान केवछ सहाराज बनारस और सुंघनी" साहु को ही प्राप्त था

सं० १९४६ में ऐसे ही कुछ में महाकवि प्रसाद का जन्म हुआ था। प्रसाद जी का बचपन बड़े छाड़ प्यार से बीता।

सम्बत्‌ १९५७ में अपनी माता के साथ उन्होंने धाराक्षेत्र , ओऑंकारेश्वर, पुष्कर, उज्जेन; जयपुर, जज और अयोध्या आदि की यात्रा की उस ससय उनकी अवस्था ११ ब्ष की थी। अमर- कन्टक पवेतमालछा के बीच, नसदा की नौका यात्रा उन्हें जीवन भर भूली थी। वहीं के दृश्यों का उनके जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ा था प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छाया में प्रथम बार उनकी कविता ने विकास के आलोक सें पदापण किया | उसी के साथ ही कबि का ग्रादुभाव हुआ

यहाँ पर मैं यह भी प्रकट कर देना चाहता हूं कि प्रसाद जी को अपने जीवन में यात्रा करने का बहुत कम अवसर मिला था। एक बार कलकता, पुरी, छब्ननक और एक दो बार प्रयाग-बस यही उनकी यात्रा विवरण है। अनेक परिस्थितियों के कारण

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प्रसाद का जीवन

“जिम्मेदारी का बोझ छादे हुए प्रसाद जी भ्रमण नहीं कर सके। ।११ बर्ष की अवस्था में जो यात्रा हुई थी, प्राकृतिक वर्णन में :उसका प्रभाव हम उनकी आरम्मिक कविताओं में ही देखते हैं; और पुरी के समुद्र तट पर बैठ कर ही उन्होंने जागरण शीर्षक (कविता १९.१२.३१ ई० को लिखी थी कितनी सुन्दर पंक्तियां हैं-- “जहों सॉन्न-सी जीवन छाया ढीले अपनी कोमल काया नाछ नयन से ढुलकारती हो ताराओं की पॉति घनी रे ।??

पुरी से लौटने के बाद ही कामायनी का कथा-भाग आगे बढ़ने लगा पुरी के समुद्र तट का प्रभाव कामायती में सरलता पूर्वक खोजा जा सकता है। मेरे कहने का तात्पय यही है. कि प्रसाद जी को कहीं विशेष भ्रमण करने की सुविधा भ्राप्त हुई होती तो सम्भव है, वह और भी अधिक पुष्ट और ठोस साहित्य का निमोण कर पाते

प्रसाद जी की एकेडेमिक-शिक्षा केवल सातवें दर्ज तक कीन्स कालेज में हुई | पिता के देहान्त के कारण बारह वर्ष की अवस्था में स्कूछ की पढ़ाई छोड़नी पड़ी, घर पर ही पंडित और मास्टर रख कर इनकी संस्कृत और अंगरेजी की पढ़ाई का प्रबन्ध इनके

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असाद और उनका साहित्य

बड़े भाई ने किया श्री० दीनबन्धु बह्मचारी उन्हें संसक्षत और उपनिपद्‌ पढ़ाते थे। अह्यचारी जी सदाचारी पुरुष थे। वेद और उपनिषद्‌ का उनका अच्छा अध्ययन था। अतएव प्रसाद जी के जीवन पर उनके शिक्षण का विशेष प्रभाव पड़ा पितामह और पिता के समय से ही समस्यापूर्ति करने वाले कवियों का जमघट रहता था। यही कारण है. कि आरम्भ सें प्रसाद जी त्रज भापा की कविताओं की ओर आकर्षित हुए।

उनकी पन्‍्द्रह बष की अवस्था थी, जब माता का देहान्त हुआ |

इन दिनों कसरत करने और पढ़ाई-छिखाई के अतिरिक्त प्रसाद जी को दूकान का काम भी देखना पड़ता था वह दूकान पर बैठे वैठे बही खाते के रद्दी कागज पर कवितायें छिखते थे एक दिल उनका यह रहस्य खुल गया उनके बड़े भाई बाबू शस्भू- रल्ल जी को पता छूग गया कि प्रसाद जी दूकान पर बैठ कर कुछ काम तो करते नहीं हैं, केवछ कविता बनाया करते हैं इस पर वह रुष्ट हुए | अव प्रसाद जी गुप्तरूप से ही यह काये करते, जिसमें किसी को प्रकट हो कुछ दिनों के बाद जब आने जाने वाले कवियों द्वारा प्रसाद जी की समस्या पूर्ति की प्रशंसा शम्भूरत्न जी के सम्मुख की गई तो प्रसाद जी के ऊपर से यह प्रतिवन्‍्ध हटा

सत्रह वर्ष की अवस्था में बड़े भाई बाबू शम्भूरत् का खर्गे- वास हुआ |

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प्रसाद का जीवन

दोनों भाइयों में प्रगाढ़ स्नेह था। शम्भूरत्न जी बढ़े उदार और खर्चीले पुरुष थे। उनका रहन-सहन उच्चकोटि का था। सुन्दर बलिट्ट शरीर, प्रभावशाली व्यक्तित्व प्रकट करता था ऐसी असामयिक दुघटना से प्रसाद जी अस्त-व्यस्त हो गये वह यही निश्चय कर पाते कि अब चह क्‍या करें। परिवार के सभी छोग चल बसे थे। केवछ एक भौजाई बच गई थीं। इस असार संसार में उनका कोई अपना था। ऐसे समय में उनकी पैक सम्पत्ति पर कब्जा करने के लिए उनके कुटुम्बियों और सम्बन्धियों का षड़यन्त्र चछ रहा था, उनके जीवन मरण का प्रश्न उपस्थित था मुझसे जब कभी वह अपनी जीवन कहानी सुनाते तो उनका चेहरा तमतमा उठता, आँखें भर आती और छलाट पर संसार की कठोरता की एक रेखा स्पष्ट खिच जाती थी। अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए भी प्रसाद जी ने पठन-पाठन को ही अपना ध्येय बना लिया था उनका अधिकांश समय साहित्यिक वातावरण में ही व्यतीत होता था। प्रसाद जी के जीवन में एक और ध्यान देने वाली घटना है, उन्हें स्वयं अपना विवाह करना पड़ा पहली पत्नी का देहान्त हम गया; फिर दूसरा विवाह किया। दूसरी स््री की मृत्यु के पश्चात्‌ उनके विचार गंभीर और ठोस हो गए थे। अब फिर से घर बसाने की उनकी छालसा थी। कुछ समय बाद ढोगों के सम-

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चसाद और उनका साहित्य

झाने पर और सबसे अधिक अपनी भाभी के प्रतिदिन के शोक- भय जीवन को सुलझाने के लिए, उन्हें बाध्य हो कर तीसरा विवाह करना पड़ा चिं० रत्नशंकर तीसरी पत्नी की सन्तान हैं

प्रसाद जी अनेक आपत्तियों और विशेषतः ऋण के कारण अधिक चिन्तित रहा करते थे। खानदानी दानशीछता और ढुम्बे खर्च के कारण वह अपनी स्थिति सुधारने में असमर्थ हो रहे थे। अन्त में छुछ सम्पत्ति बेंच कर वह ऋण भार से मुक्त हुए।

१९१० ईं० तक हिन्दी का पुस्तक-प्रकाशन बाल्यावस्था में था। अच्छे साहित्य की तो मांग ही थी और ऐसे प्रकाशक ही थे। मासिक पतन्न-पत्रिकाओं में एक सात्र 'सरस्वती' का ही स्थान था। प्रसाद जी का आचाये हिवेदी जी से कुछ मत-भेद था। यही कारण था कि प्रतिभाशाली होने के कारण भी 'सर- खती” से उन्हें श्रोत्साहन नहीं मिला, जैसा कि श्री० मैथिली शरण गुप्त पं० रामचरित उपाध्याय और सनेही जी को मिला था शायद इसीलिए ही प्रसाद जी ने एक साहित्यिक पत्र निकालने का निश्चय किया।

उनके आदेशानुसार उनके भॉनजे श्री० अम्बिका प्रसाद गुप्त ने 'इन्दु” मासिक पत्र का प्रकाशन आरस्म किया इन्दु उच्चकोटि का साहित्यिक सासिक पन्न था प्रसाद जी उसमें बराबर लिखते रहे। उनकी कविता, कहानी और लेखों से “इन्दु! सुशोमित रहता था। आधिक हानि के कारण मासिक पत्र चछाना उस समय

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प्रसाद का जीवन

बड़ा कठिन था; किन्तु प्रसाद जी “इन्दु! को आर्थिक सहायता देते हुए आगे बढ़ाते गए “इन्दुः ने साहित्य की जो सेवा की है, वह हिन्दी साहित्य का इतिहास बनाने बालों से छिपी नहीं है। पं० रूपनारायण पाण्डेय भी उस समय इन्दु” के सम्पादकीय विभाग में थे

१९१० ई० में जिस साहित्य का निर्माण प्रसाद जी ने आरम्भ किया था; उसका विकास और प्रचार धीरे-धीरे बढ़ने लगा

नियमित रूप से प्रसाद जी लिखते रहे अतएवं अन्य मासिक पत्र-पत्रिकाओं की उत्सुक्ता बढ़ी, और सम्पादकों का अनुरोध प्रसाद जी टा सके उन्हें सबके लिये कुछ कुछ लिखना ही पड़ता था इसमें सन्देह नहीं कि माधुरी” के जन्मकाल से ही प्रसाद जी की छेखनी वेग से चलने छगी।

१९२३ ई० में प्रसाद जी से मेरा परिचय हुआ था।

१९२३ ई० से १९२९ ई० तक प्रकाशित होने वाली प्रसाद जी की पुस्तकों की सूची इस तरह है--रकन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त, कामना, आकशदीप) आँसू, कंकाछ और एक घूँट। १९२९ ई० से १९३७ तक आँघी, तितली, भुवस्वामिनी, इन्द्रजाछ, लहर, कामायनी, फुट- कर छेखों बाली पुस्तक&ओर अधूरा इरावती उपन्यास

मैंने देखा है, प्रसाद जी की दिनचय्योही साहित्यिक थी। प्रात:- काल से रात्रि तक वे या तो पढ़ते-लिखते अथवा लेखक और कवियों से साहित्यिक चचो होती रहती। उन्हें अवकाश ही

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प्रसाद और उनका साहित्य

मिलता कि चह अपने व्यवसाय की ओर ध्यान देते अधिक से अधिक वह इतना ही करते थे कि कस्तूरी का व्यापारी आया तो कस्तूरी परख कर खरीद छेते। “भपका” चढ़ा तो गुलाबजल और इल्नों की देख-रेख कर छेते। प्रसाद जी अपने व्यवसाय के पूण ज्ञाता थे। वे सुर्ती, इत्र और हर तरह के टॉयलेट” का सामान बहुत सुन्दर बना लेते थे। छेकिन इस कार्यों में उतका मन ही लगता

सन्ध्या समय नारियछ बाज़ार में उन्तकी दूकान के सामने चाले चबूतरे पर बैठक जमती साहित्यिकों का नियमित जमघट होता। से बजे रात तक बातें होती रहतीं। कभी-कभी आने वाले छोगो में साहित्यिक प्रश्नों पर तक भी होने छगता। प्रसाद जी मौन होकर सुनते और अन्त सें कभी बहुत पूछने पर अपना मत प्रकट करते।

बहुधा व्यर्थ समय नष्ट करने वाले मनुष्य भी आकर उनके यहाँ एकत्रित हो जाया करते थे। उनके चले जाने पर मैं उनसे कहता--पता नहीं आपको इन मूर्खो को बैठा रखने में क्या मज़ा मिलता है

तो वे व्यंग पूर्वक कहते--क्या तुम.यह चाहते हो कि ऐसे छोगों को मैं अपने यहाँ आने से मना करूं

प्रसाद जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह किसी को दुखी और अपमानित नहीं करना चाहते ये

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प्रसाद का जीवन

कुछ लोगों की ऐसी धारणा है कि प्रसाद जी मौन गमस्भीरता का अभिनय कर अपना गौरव बनाये रखने की चेट्टा करते थे मैंने अपने इतने दिनों के ढम्बे साथ में उन्हें सबेदा मढुभाषी, हँसमुख, मिलनसार, सहृदय और व्यवहार-कुझल पुरुष ही पाया हाँ, वे “इन्टरव्यू सम्मति और विवादप्रस्त प्रश्नों के उत्तर देने से सदैव ही दूर रहते थे; क्योंकि इस बीसवीं शताब्दी के पत्रकारों की तिलछ का ताड़बना देने वाली आदत से वे भलीभांति परिचित थे

मैंने तो यहाँ तक देखा है कि जिन छोगों ने उनकी रचनाओं की तीत्र आलोचना लिखी है, उनके प्रति भी प्रसाद जी कोई दोष नहीं रखते थे। सामना होने पर मुस्करा कर सज्जनोचित रूप से पेश आना और उस आलोचना के सम्बन्ध सें भूछ से एक शब्द अपनी ज़बान पर छाना उनकी विशेषता थी।

यहाँ पर यह भी लिख देना अनुचित होगा कि आरस्म में खर्गीय प्रेमचन्द जी भी प्रसाद जी के विरोधियों में थे। उन्होंने प्रसाद जी के नाटकों के सम्बन्ध सें लिखा था कि नाटकों में ऐसे प्लॉट का उपयोग करना गड़े मुर्दे उबाड़ना है। उनकी यह आडो- चता 'साधुरी' में प्रकाशित हुई थी।

प्रेमचन्द और प्रसाद दो ही सम्मानित महारथी हिन्दी संसार में विशेष श्रद्धा के पात्र थे। प्रेमचन्द जी के इन शब्दों का प्रभाव प्रसाद जी के ऊपर अवश्य पड़ा था, किन्तु बाहर से चह प्रकट नहीं करना चाहते थे

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प्रसाद और उनका साहित्य

हिन्दी के साहित्यिक--बाज़ार में उन दिनों दुलवन्दी की घूम थी। एक तरफ विख्यात प्रोपोगैन्डिस्ट पं० बनारसी दास चतुर्वेदी अपना बंगीय शंख फूंक रहे थे। दूसरी तरफ बाबू ढुलारे छाल भार्गव उदीयमान लेखकों का साँचा तैयार कर रहे थे। ये दोनों भहा पुरुष प्रसाद जी के विरोधियों में थे

एक दिन आवेश में आकर, मैंने प्रसाद जी से कहा--मैं इन छोगों का उत्तर देना चाहता हूं

उन्होंने कहा--लिखने दो; मैं खुद उत्तर देना चाहता हूं और तुम्हें ही सलाह दूंगा

उन दिलों नोबुल आइज विजेता स्ीस छेखक कोर्ल स्पिटलर की “लाफिंग द्रथस” पुस्तक सैं पद रहा था। उसमें एक स्थान पर लिखा थाः--

ध्यहों एक और सुन्दर दृश्य है। एक लेखक समूह दूसरे समूह को गये के साथ पशुवत आचरण करने वाला सिद्ध करके समाज से प्रथक करता है और दूसरा समूह भी उन्हें विरवास घातक तथा भ्रष्ट कह कर उनका परिचय लह्लियों की देता है और इस पर भी हम छोनों को श्रन्थकार की कला का सम्मान करने के लिये कहा जाता है। मैं नहीं जानता कि इसकी आरम्भ किसने किया, किन्तु मेरा सम्बन्ध इस बात की खोज करने से, कि इसका अन्त कौन करेगा, बहुत अधिक है ।'

मैंने यह वर्णन प्रसाद जी को दिखलछाया। वह मुस्कराये, बोले-- रद

प्रछखाद का जीवन

ऐसे छोग सभी युग में और सभी साहित्य में रहे हैं और रहेंगे। उन पर ध्यान देना चाहिये

मेरे यह लिखने का तातपय॑ यही है कि ऐसी बातों को ढ्ेष के रूप में प्रसाद जी अपने मस्तिष्क में स्थान नहीं देते थे |

उस आछोचना के कई मास वाद प्रेमचन्द जी प्रसाद जी' के यहाँ आये और उन्होंने अपने लिखने पर खेद प्रकट किया

प्रसाद जी ने बढ़ी सरछृता से कहा--मुझे उसका कोई ख्याल नहीं है !

कंकाल” की आलोचना करते हुए उसी भाष को प्रेमचन्द जी ने स्वयं प्रकट किया था--

कंकाल! प्रसाद जी का पहला ही उपन्यास है, पर आज हिन्दी मे बहुत कम ऐसे उपन्यास हैं, जो इसके सामने रकक्‍्खे जा सके। मुझे अब तक आपसे यह क्षिकायत थीं, कि आप क्यों प्राचीन वैभव का राग अलापते हैं, ऐसी चौनें क्‍यों नहीं लिखते जिनमें चर्तमान समस्याओ की गुत्थियाँ सुलझायी गयी हों। जाने क्यों मेरी यह धारणा हो गई है, कि हम आज से दो हज़ार वर्ष पूर्व की बातों ओर समस्याओं का चित्रण सफलता के साथ नहों कर सकते मुझे यह असम्भव सा मालूम होता है। हमको उस जमाने के रहन- सहन, आचार-विचार का इतना अत्प ज्ञान है, कि फदम-कदस पर ठोकरें खाने की सम्तावना रहती है। हमकी बहुत कुछ कल्पना का आश्रय लेना पढता है, और कत्पना यथाथ का रूप खड़ा करने में बहुधा असफल होती

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प्रसाद और उनका साहित्य

है। शायद यह भेरी श्रेरणा का फल है, कि प्रसाद जी ने इस उपन्यास में समकालीन सामाजिक समस्याओं को हल करने को चेश की है, और खूब की है। भेरी पहली शिकायत पर कुछ लोगों ने मुझे खूब आडे हाथों लिया था, पर अब मुझे बह कठोर बातें बहुत प्रिय रूग रही हैं, अगर ऐसी ही दस पांच लताडों के बाद ऐसी सुन्दर वस्तु निकल आए, तो मैं आज भी उनको सहन करने को तैयार हैँ

अन्त में घनिष्टता इतनी बढ़ी कि प्रति दिन प्रातःकारू जब प्रसाद जी टहलने के लिए विक्टोरिया-पा्क में जाते थे तो श्रेम- चन्द्‌ जी से उनकी मुछाकात बराबर होती

प्रसाद जी की अन्तरंग मण्डली बहुत बड़ी थी। वह किसी के यहाँ जाने में हिचकते थे। जब कभी वह घर से बाहर निकलते तो उनके लिए दो ही स्थान थे, या तो श्री० राय कृष्णदास के यहाँ अथवा भेरे यहाँ। उनके मित्रों में राय कृष्णयास जी और पं० केशवप्रसाद मिश्र अग्युख थे

मित्रता के सम्बन्ध में प्रसाद का क्‍या सिद्धान्त था, इसका आभास “आधी” कहानी के इस अंश में झलकता है

'मिन्न मान लेने में मेरे मन को एक तरह की अढचन है। इसलिए मैं आय" अपने कहे जाने वाले मिन्नों को भी जब अपने मन में सम्बोधन करता हैं, तो परिचित ही कद कर, सो भी जब इतना माने बिना काम नहीं चछता। मित्र मान लेने पर मनुष्य उस से शिवि के समान आत्मत्याग, वोधिसत्व के सहश सर्वस्व समर्पण की जो आशा करता है और उसकी शक्ति की सीमा

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प्रसाद का जीवन

को तो प्राय अतिरंजित देखता है। वैसी स्थिति में अपने की डालना मुझे पसन्द नहों। क्योंकि जीवन का हिसाब-किताव किसी काल्पनिक गणित के आधार पर रखने का मेरा अभ्यास नही, जिसके द्वारा मनुष्य सबके ऊपर अपना पावना ही निकाल लिया करता है

कभी-कभी हमलछोग इक्के पर बेठ कर पं० केशवम्नसाद सिश्र और भाई वाचस्पति के थहाँ जाया करते थे

मुझे असी तक भूला नहीं है. कि एक तरफ पैसे के इक्के पर मैं और प्रसाद जी जा रहे थे, और दूसरी ओर से) विश्वविद्यालय से आते हुए, स्व० छाछा भगवानदीन, पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय “'हरिऔध” और पं० रामचन्द्र शुक्व एकही इक्के पर लदे चछे रहे थे

सहसा मैं प्रसाद जी से कह उठा--देखिए, यह हिन्दी साहित्य का कितना बड़ा दुभोग्य है कि उसके इतने बड़े-बड़े महारथी छोग छः पैसे के इक्के पर धूछ फॉकते चले जा रहे हैं

इस अवसर पर वह खिलखिला कर हँस पढ़े

प्रसाद जी बढ़े हास्य-प्रिय थे। वह बड़ा सुन्दर मजाक करते थे, किन्तु केवल अपने अन्तरंगों के साथ

श्री० मैथिलीशरण गुप्त, स्वर्गीय अजमेरी जी के साथ काशी आते तो कभी राय कृष्णदास जी अथवा प्रसाद जी के यहाँ मंडली एक-

त्रित होती खूब आनन्द आता था स्व०अजमेरी जी तो हँसी के खज़ाना थे।

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असाद और उनका साहित्य

प्रसाद जी भोजन के बढ़े शौकीन थे। चह स्वयं अपने हाथ से अच्छा खाना बना छेते थे एक बार बगीचे की सैछ थी | मंडी में २०-२० आदमी थे। भोजन और ठंडाई का पूरा प्रबन्ध था। दाल, चावल अछग-अछग हॉड़ियों में चढ़ गया। प्रसाद जी गोभी; आल, मटर की तरकारी और चूरमे का लड्डू बनाने में व्यस्त हो गए। बड़े उत्साह से उस दिन उन्होंने बनाया था। उनके बनाये हुए पदार्थ इतने स्वादिष्ट थे कि आज तक भूले नहीं हैं। उसके बाद तो अनेक अवसर आये, छेकिन वह तरकारी बड़ी सुस्वादु बनी थी मुझे उसी दिन पता छगा कि प्रसाद जी भोजन बनाने में भी कुशल हैं

प्रसाद जी को पृष्पों से अधिक प्रेम था। उन्होंने अपने मकान के सामने एक छोटा सा बगीचा छगाया था प्रति दिन बह दो |, त्तीन घन्टा उससें लगाते थे। तरह-तरह के फूलों की क्यारियों बनी थीं। गुलाब, जूही, वेछा, रजनीगंधा इत्यादि जब फूलते तो मुग्ध होकर वह देखते। वो के दिनों में चह छोटी-सी बाटिका अत्यन्त मनोस्म मालूम पड़ती थी। पारिजात के वृक्ष के नीचे एक पत्थर की चौकी थी, उसी पर बेंठ कर प्रसाद जी अपनी रचनाएं सुनाते थे

प्रसाद जी को एक शतरंज को छोड़ कर और अन्य किसी खेल से प्रेम था | वहखिलाड़ी मिल जाने पर शतरंज अवश्य खेलते थे। मुझे यह मनहूस खेल पसन्द नहीं था, अतएव मैं सदा इसका

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प्रसाद का जीवन

विरोध करता इस पर वह कभी चिद भी जाते | मैं मौन होकर बैठा रहता

संसार के किसी महान्‌ लेखक--छ्यूगो; टॉल्सटाय, ड्यूमा की रचनाओं पर तैयार की हुई फिल्‍म जाती तो बह सिनेसा भी चढे जाते थे सब से अधिक नाव पर बैठ कर सैर करना ही उन्हें पसन्द था

१९३१ ई० में प्रसाद जी का साहित्यिक कार्य क्रम शिथिलू हो रहा था। उन्होंने एक सकान बनवाया था। उसमें खर्च काफी हो गया। उधर आय भी कम हो गई थी। व्यवसाय की ओर ध्यान देने के कारण दिन पर दिन हानि की सम्भावना ही दिखाई पड़ने छगी।

मन-बहछाव के विचार से ही सपरिवार वह पुरी गये थे। मैं उनके साथ कलकचे तक गया था पुरी के र्मणीक दृश्यों ने उनके कवि-हृदय को अश्वासन तो दिया परन्तु अधिक खर्च हो जाने के कारण मानसिक व्यग्रता फिर उपस्ित हुई। क्‍या होगा ? कैसे चलेगा ९--रूस्ववादी होने पर भी इन प्रश्नों में वह उलझ गये , आर्थिक समस्याओं के कारण अब वह नियमित रूप से कारखाने का कार्य देखने छगे

(हंस! मासिक रूप में, कहानियों का मासिक पत्र, प्रेमचन्द जी के संस्पादन में निकल रहा था; उसका नाम करण और योजना असाद जी की ही थी। वह उसमें बराबर लिखते रहे | अब

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अखाद जौर उनका साहित्य

उनका विचार था कि काशी से एक छुद्ध साहित्यिक पाछ्तिक पत्र निकाला जाय

भाई शिवपूजन जी भी उन दिनों काशी में ही रहते थे हम छोगो ने शीघ्र ही निश्चय कर लिया कि उनके सम्पादन में पत्र का प्रकाशन आरम्भ कर: दिया जायगा। अतएब प्रसाद जी से पूछा गया कि पत्र का नाम क्या होगा; दो दिन विचार करने के बाद, उन्होंने पत्र का नाम जागरण ? रक्खा।

बसन्त पंचमी ११ फरवरी १९२०९ ई० को पुस्तक मन्दिर से “जागरण! का प्रथम अँक प्रकाशित हुआ था जागरण” को उनका पूर्ण सहयोग प्राप्त था। शिवपूजन जी उन्हीं के आदेशानुसार उसका सम्पादन करते थे पूर्ण साहित्यिक होने के कारण पत्र सबब-सा- धारण के उपयुक्त था। अतएव उसमें भारी हानि होती जा रही थी अन्त में वह पतन्न ग्रेमचन्द जी को दे दिया गया। प्रेम- चन्द जी के सम्पादन में वह साप्ताहिक हो कर निकछा |

प्रसाद का वास्तविक जीवन बहुत ही स्पष्ट था। मैंमे उन्हें सदैव ही सात्विक पाया। पान को छोड़ कर उन्हें और कोई व्यसन नहीं था; वह भाँग तक नही पीते थे। माँस-मदिरि से हार्दिक घृणा सी थी। शराबी चरित्रों का निमोण करने में वह अत्यन्त स्वाभाविक थे, किन्तु उन्होंने लोगों को पीते हुए और नशे में देखा था। लेकिन खुद कभी नहीं। चौद्‌ह ब्ष तक प्राय प्रतिदिन प्रसाद जी के साथ रहते हुए भी मैंने उनमें कोई दुग्गुण नहीं देखा |

डर

प्रसाद का जीवन

छेखक के चरित्र का प्रभाव उसकी रचनाओं में कहाँ तक पड़ता है, यह एक विवाद का विपय है। “जागरण में कविवर निराठा जी का चरित्र पर एक लेख प्रकाशित हुआ था। उसमें उन्होंने लिखा था---

'क्ालिदास, श्रीहर्प, शेक्सपीयर, वायरन, उमरखप्याम, रवीन्द्रनाथ आदि कवि काव्य में बड़े चरित्रवान हैं या असचरित्र इनकी कथाओं से हमें क्या मिलता है ? इनका चुम्बनालिंगन काव्य क्यों बडेनवड़े लोग पीते ; रहते हैं ? यह वमन पीना वन्द्‌ करा दौजिये | 'घूंघट के पट खोल री, तोहें राम मिललेंगे---यह क्या है? क्यों महात्मा जी इसे गाते-नाबाते हैं ; पाप अगर . नीचे की तरफ जाता है, तो नौचे क्या है-अघः ब्रह्म नहों /'

मेरा कवि सदा निरपराध है। मैं क्‍या कहूँ, वह क्या क्या करता है

प्रसाद जी ने जागरण के अग्रलेख में छिखा था-- हाँ, अपवित्रता, असतओर दुश्वरित्र कला का उद्देश्य होना चाहिये यदि कोई कछाकार चारित्रिक पतन के कारण अपने व्यक्तित्व की नष्ट करके भी कला में कल्याणमयी सृष्टि कर सकता है, तो उसका विशेषाधिकार मानते हुए प्रायः लोग देखे जाते हैं। कालिदास आदि के सम्बन्ध में ऐसा ही कहा जा सकता है, किन्तु इसका यह मतलब नहीं कि कलाकार को कुचरित्र होना ही चाहिए। यह निसंकोच कहा जा सकता है कि कलाकार की कसौटी उसकी कला है, कि उसका व्यक्तित्व वाल्मीकि और व्यास का आदर्श देखते हुए तो यह कहना पढ़ता है कि बिना जले हुए, विदग्ध साहित्य की सृष्टि नहीं हो सकती, और तव कलाकार अपनी कला में व्यक्तित्ष को खो कर कला के ही रूप में प्रतिष्ठित होता

रे डरे

प्रखाद और उनका स्गहित्य

है। उसे जनता का सम्मान मिलता ही है, चाहे आज मिले या हज़ारों वर्ष बाद ।'

अतएव यह ठीक ही है कि कछा को, छेखक को चरित्र की कसौटी पर कसना चाहिये। यदि संसार के महान लेखकों का चरित्र अन्वेषण किया जाय तो अधिकांश असचरित्र और विलासी प्रमाणित होंगे। संसार के साहित्य पर अमरता की छाप डालने वाला; फ्रेच कछाकार विक्टर ब्यूगो का ही चरित्र छीजिये। उननी- सर्वी-शताव्दी में विश्व-साहित्य उसके चरणों पर नत-मस्तक हो गया था। उसने जिस साहित्य का निमौण किया, वह आज तक हिसाचलछ की तरह अटल है। किन्तु व्यक्तिगत जीवन उसका दूसरा ही था। अपनी पत्नी एडिली और प्रेयसी जूलियट के होते हुए भी वह एक यहूदी अभिनेत्री की ओर आकर्षित हुआ उन दिनों फ्रांस सें इस तरह के अपराधी के लिए बड़ा कठोर दृण्ड नियत था। विक्टर द्यूगो और यहूदी नटी दोनों दी जेलखाने की हवा खाते, लेकिन विक्टर स्वयं 'हाउस आफ पियसे! का मेम्चर था इसलिए छुछ हो सका। कुछ छोगों का तो यह भी कहना है कि खयं बादशाह छुई फिलिप ने इस मामले को शानन्‍्त किया

प्रसाद जी की अल्हड़ जवानी सें भी एक घटना ऐसी ही घटी थी यह मुझे बाद में पता छगा जब १३ फरवरी १९३६ ई० को मैंने उनसे पूछा--“आपकी रचनाओं में प्रेम का एक उज्वल

झट

पसाद का जीवन

रहस्य छिपा हुआ है, छेकिन मुझे इतने दिनों में भी आपने यह नहीं बतछाया कि आपकी वह अज्ञात प्रेयसी कोन थी ९?

उन्होंने जो कुछ उत्तर दिया उसके पश्चात फिर इस सम्बन्ध में मैंने उनसे कुछ नहीं पूछा

प्रसाद जी का व्यायाम की ओर बचपन ही से अभ्यास था बह एक हज़ार बेठकी और पाँच सो दण्ड अपनी जवानी में प्रति दिन करते थे उन्हे कसरत कराने वाछा शिक्षक उनसे बॉह करने में थक जाता था। दो एक बार कुछती में भी उन्होंने उस कछा के विशेषग्यों को परास्त किया था। इससे उनके बढ़े भाई की प्रसन्नता बढ़े गई थी। अपनी खुराक के बारे में प्रसाद जी खयं कहते थे कि फल, दूध और घी के अतिरिक्त वह आध' सेर बदाम प्रति दिन खाते थे।

प्रसाद जी का मध्यम श्रेणी का कद था। गौर वर्ण, गोल मुँह, दाँत सब एक पक्ति में--हँसने में बहुत स्वाभाविक मारूस पड़ते थे। जवानी सें तो द्वाका के मलमरू का छुतों और शान्तिपुरी धोती पहनते थे; छेकिन बाद में खद्दर का सी उपयोग करते रहे। जाड़े में सुंघनी रंग के पट्टू का कुश्ता अथवा सकरपारे की सींयन का रुईदार ओवरकोट पहनते थे। आँखों पर चश्मा और हाथ सें डण्डा-असाद जी का व्यतित्व बहुत ही आकष्षक था |

प्रसाद जी ने अपने जीवन में पुरस्कार रूप भें एक पैसा भी किसी पत्र-पत्रिका से नहीं लिया बह निस्‍्वार्थ भाव से साहित्य-

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अ्र्ताद और उनका साहित्य

सेवा करते रहे हिन्दुस्तानी-एकेडमी से ५००) का और नागरी प्रचारिणी सभा से २००) पुरस्कार उन्हें मि्ता था। यह ७००] भी उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा को अपने भाई के स्मारक सखरूप दान दे दिया |

प्रसाद जी के जीवन में यह एक नोट करने की वात है कि उन्होंने किसी कवि सम्मेछन अथवा सभा का सभापति होना कभी स्रीकार नहीं किया कवि सम्मेलन में यदि कभी जाते भी तो अपनी कविता सुनाना उन्हे पसन्द नहीं था। बहुत आग्रह करने पर अपनी छिखी पुस्तक में से वैठ-वेठे कुछ पढ़ देते थे। जीवन में पहली वार नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से कोपोत्सव के अब: सर पर उन्होंने खड़े हो कर जनता के सन्मुख “नारी और छज्ञा' कविता पढ़ी थी। वाह-बाह की पुकार मच गई। सचमुच प्रसाद जी ने इतने सुन्दर ढंग से सुनाया था कि सभी मुग्ध हो नये थे।

दिसम्बर १९३६ ६० तक अ्रसाद जी कुछ साहित्यिक कार्य करने के छिये निश्विन्त हो सके थे। सन्‌ १९३१ से लेकर ३६ तक अन्य पुटकर कविता कहानी और लेखों को छोड़ कर प्रसाद जी ने केवछ भ्ुवखामिनी नाटक, काम्रायनी महाकाव्य और इरावती »'धृरा उपन्यास ही छिखा | इन सात वर्षों में पारिवारिक और आश्थिक समस्याओं के कारण प्रसाद जी प्रायः चिन्तित दिख- छाई पढ़े | कामायनी के साथ उन्हें कठोर तपस्या करनी पड़ी थी |

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प्रसाद का जीवन

जिस दिन कामायनी समाप्त हुईं, उनके चेहरे पर एक अपूर्त शान्ति विराज रही थी

मैंने कहा--“आपने हिन्दी साहित्य के भंडार में सब कुछ भरा है; उसके प्रत्येक अंक की पूर्ति की है

वे मौन थे। केवछ इतना ही कहा--“कामायनी लिखकर सुझे सन्‍्तोष है ।!

छखनऊ प्रदर्शनी से लौट कर मैं आया था उहोंने कहय--मैं भी छूखनऊ जाना चाहता हूं

मैंने कहा--अवश्य जाइये, परिवर्तन से दिल बहलाव हो जायगा !'

इसके बाद लखनऊ से जबबे छौटे तो मलीन से दिखलाई पढ़े। २८ जनवरी ३७ से उन्हें ज्वर आने छगा। हम लोगों ने समझा; साधारण ज्वर है; दीक हो जायगा २९ फरवरी को उनके कफ की जॉच कराई गईं, तो मारछ्स हुआ कि उन्हें राजयक्ष्मा हो गया है।

इस रोग के परिणाम से प्रसाद जी सलीभांति परिचित थे डनकी पूरे पत्नी का देहान्त भी इसी रोग के कारण हुआ था। उनकी बातों में जीवन के प्रति उदासीनता दिखछाई पड़ने छूगी

मैं प्रतिदिन उनसे मिलने जाया करता था। घन्टों बैठ कर इधर-उधर की बातें करता, जिसमें उनका सन बहला रहे कभी एक दिन कुछ अच्छे हो जाते, फिर कष्ट बढ़ जाता। कफ काफ़ी निकलने छगा था। शरीर शिथिल होता जा रहा था। प्रायः सभी

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प्रसाद और उनका साहित्य

का कहना था कि परिवर्तन के लिये किसी पहाड़ अथवा सेनोटो- रियम में प्रसाद जी को छे जाना चाहिये। लेकिन उन्होने इसको स्वीकार नहीं किया वह काशी छोड़ कर कहीं बाहर नहीं जाना चाहते थे।

प्रसाद जी में एक बात और विशेष थी कि वह जो निश्चय कर लेते फिर उसी पर अटल रहते, किसी के समझाने का कोई असर पड़ता था। हम छोगो ने यहाँ तक कहा कि यदि आप बाहर नहीं जाना चाहते तो जाने दीजिए, यहाँ सारनाथ के पास किसी बगीचे में ही चल कर कुछ दिन रहिए डाक्टरों का कहना है कि इस रोग में सब से बड़ी औषधि वायु परिवर्तन ही है।

सारनाथ के पास बगीचा ठीक किया गया। बहुत कुछ सम- झाने पर किसी तरह उन्होंने वहाँ चछना स्वीकार कर लिया सब सामान छारी द्वारा वहाँ पहुँचाया गया, किन्तु अन्त में वह वहाँ नजा सके।

मैं जब पहुँचा तो बड़े करुण शब्दों सें उन्होंने मुझसे कहा-- “जो होना होगा वह यहीं होगा ऐसी अवस्था में अब घर से बाहर जाने में और भी कष्ट होगा ।”

मैंने कहा--/जैसी इच्छा, जाने दीजिये ।”

प्रसाद जी धार्मिक मनोदृत्ति के पुरुष थे। वह शिव के उपासक थे। आचार-व्यवहार में भी वह आस्तिक थे। किसी के हाथ की कची रसोई खाने तथा जूता पहन कर पानी आदि पीने से परहेज

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प्रसाद का जीवन

रखने में भी वह हृद थे अपने अन्तिम समय तक जब पुजारी

प्रति दिन की तरह पूजा कर के शिव का चरणाझ॒त, बेलपत्र और

फूछ छाता तो वह उसे श्रद्धा से आँखों और सस्तक पर छगा ल्ते मैंने सदेव उन्हें ऐसा ही देखा

“इसी तरह अच्छे और बुरे दिनि सुख-हुःख की कसोदी पर अपनी रेखायें अंकित कर जाते थे।

मैं कहता--“बरसाती दिन बीत जाने पर सर्दी में आपका खास्थ्य सुधर जायगा [*

वे कहते--“देखो कया होता है ? कमजोरी बढ़ रही है, शरीर शिथिल होता जा रहा है

उनकी ऐसी अवस्था देख कर हृदय पर बड़ा भीषण आधात्त छगता फिर भी मैं उन्हें सान्‍्त्वना देने की चेष्टा करता |

आठ-नो महीने तक होम्योपैथिक चिकित्सा ही चलती रही। इसका एक कारण यह था कि प्रसादजी परहेज्ञ नहीं करना चाहते थे।

चि० रल्नशंकर ने स्कूछ की पढ़ाई छोड़ दी थी। वह प्रसाद जी के सामने से ही कारखाने का काये सीखते थे। प्रसाद जी स्वयं उन्हें अपने साथ काम सिखकाते थे

साहित्यिक कार्यक्रम तो उनका पूर्ण था ही, साथ-ही-साथ परिवारिक प्रबन्ध में भी कोई न्रुटि नहीं थी। फिर भी सम्तान की समता के जार से वह अछग हो सके। उनके दाशेनिक विचार और सिद्धान्त स्वयं एक पहेली से बन गये

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प्रसाद और उनका साहित्य

अब रोग इतना बढ़ गया था कि डाक्टरों ने उनका किसी से सेंट और बात करना भी बन्द करवा दिया। उनकी ऐसी अवखा देख कर सभी छोग व्यग्र हुए | सव के अनुरोध पर उन्होंने वेधक चिकित्सा खीकार की दो-महीने आयुर्वेदीय औषधियों का सेवन चलता रहा | उससे भी कुछ छाम हुआ |

अन्त में फिर उसी होमियोपैथिक चिकित्सा पर ही प्रसाद जी निर्भर रहे।

उनके फैछाशबास के बीस दिन पहिले मैं उन्हें देखने गया |, था। यही उनसे मेरी अन्तिम भेंट थी। वे पलँग पर पड़े थे। सूखी हड्डियों के ढांचे पर मॉस का एक पतला सा आवरण मात्र ही रह गया था--मुख कान्तिहीन, पीछा-सा, आँखें धँसी हुई) उन्हें बात करने में भी बड़ा कष्ट होता था।

बहुत देर चुप रहने के बाद मेरी तरफ देखते हुए हाथों को ऊपर उठा कर उन्होंने कहा--देखो” !

मैं समीप जा कर उनका हाथ देखने छगा। उस भीषण रोग के साथ ही उन्हें चमम रोग हो गया था, लेकिन उस समय तक चह अच्छा हो चुका था कुछ चिह्न मान्न शेष थे |

उस दिन वहाँ से छौटकर मुझे खाना-पीना कुछ भी अच्छा लगा मैंने समझ लिया कि अब प्रसाद जी इस दुनियाँ पर चन्द