प्रण प्रन्य माखाक्रा चतुथ पुष्प!

-भ वृन्त सँ जीव हे &

८९८

[ सचित्र पुस्तक] रम्भः ह, ॥\ किष)

भरण +. .\ छलक , ५, श्री स्वामी मङ्लानन्द्‌ पुरीजी। ९.

भूमिका रेखक री प° केशव राव जी जज हाडकोर, हिदरायाष-दक्षिण प्रकाशक

एस एस घर्मा एन्ड कम्पनी ~ . १६८ भतरस्तथो, प्रयाग 144 1:

1 {

^ १।१५

स० १६८१ विर, सन्‌ १६.४ ₹०।

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पष न्म्‌* १,९७१२९४९१०२४ धाग्ड्‌] (; ॥।

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इस पुस्तक को पएपनेका > } अधिकार प्रत्येक शो {* #

मिलने का पता।

( 5 (२) ॐेलक ( मापोत प्रक (३) बाघ निवन्रस नारायण, . कके, शुडूख दोड ६० आर० का्पुर ८४) कष्ण गोपाल जी ` मुखाज्ञिम ` ायघ्रेस आ्वसमाज, कानपुर }

1 # 1५1

अध्याय कां विषय भभ्याय कुं आरम्मिर वाते' ४4 पौरष ष्टी सिर्न + भासाहारी पौधों फी छिस्मे पोषा कट या जन्तु गृत्त फी अन्य जन्तुभों से समानवा + श्वासक्तेतार। दैखता सुनता सूंषता है + खाति है। % सोवा है » सादो ओर गवि रखता है १० रोगी होता दै। १९१

नर मादा शोत, सन्तान छद्‌ ताओौर

शिश्वा नाता र्खताहै। १२ + ज्ञान रक्षता है) १३ > इच्छया ओर प्रयत्न रखतः है १४

सुखी दुखी होता भोर श्र से

पु०

११७

१२६ १२३३ १९२ १३१ १५०

१७१ १९८१ १८५ १९० १६९ २० 1 २१० २९१९ २२४ #

भअभ्याय षा विषय

#

भप्नी रस्ता करता है | युत्त मे चेतनता के सव ल्ण पये जाते है फी आयुं ओर मल्यु शोषी है म० ज० चन्द्र का परिचय) मण चुके यन्न्र। , \ म० ज० चन्द्र जी की जांच पद्वाल म० वसु का निर्णय ~

[१

1 १.

खंड-यवेदादि के प्रमा

" स्वामी द्यामन्द्‌ः का (न्य } दथानन्दू-वेद्-भाष्य दयानन्द नि्रय'पर शङ्का समाधान 'विद्धानो की प्रम्मतियां पुराण महा मास्व 1

¦ जैन बौद्ध मों की साक्ती।

येक का निणय `

4 १5०६-7, ९६ न्याय दशन

वैशेिर

भभ्याय

पष्यार्यो का विषय ~

ष्ट + २४१ व्द॑न्ति-देशन २४४ , 1, मास्य ¢ रश ' ` 1' मनुष्मरति। २५६ उपसिषद्‌ ` २६९ मेद। २७८ वेदो सम्बन्धी प्रशनोतर 1 खंड -श्रा्ेषो' फे उतर धृष 1 + २६६ घृश्त मे अभिमानी जीवर है ३०६ घीजमे अनुशयो + ३१६ ष्वावल आदि में जीव नष्ठीहै। इश्ध, फलम्‌ लगाने पर्‌, विचार ३३१ ब्म इच्छा पूवक प्रृत्ति है ३४१ » भोक्ता है। १४४ + इदूर्भिरजरहै। ^" ˆ^ व्याकरण इनकारी नष्टा देष वैशेषिक भी इनफारी नी है 1 २५४ शकराचाये विरोधी नटीं यथे ५७ धृतो मे जीद ओर प्राण. दोनो ३६५ „„ सुखी दुखी दोना 81. ३७१ पर्थरादि मे जीव दने पर विचार।

[-3 1

अध्याय

५्- कत) > वि

[रष्वे ^

पय,

[+

खंड-हिसा पर विचार।

घ्ष्याय का विषय अध्याय विना दिन्साकाम चलस्कहाहै। हिसासेनी हम पापो नष्दो सकते। कृषो पर हमारा स्वत्व है } हमारा स्वाभाविक मोजन मासहषर भू पापपर चिचारे स्वाथ पर। अन्य हिन्पार्खो से तुलना हिन्सा- पाप निवारण & भरायर्चितं ) १० परिशिष्ट परिशिष्ट ठा निश्चय सश््या पौधों की किसे विद्धानो कां सम्मतिं ५२ दयानन्द निणेय पर शका समाधान १३ व्याकरण इतकारी नहीं है ि पकच्िटरी 1 दाताओं को धम्यकाद्‌ +

शदाञ्ुद्ध पन्न

, पृस्तक सूची

[व जिनकी सदायता से यह पुस्तक तैयार की - गई है। सर ग्रन्थकतो, भन्‌, ०, या प्रका० संस्कत पुस्तके"

ऋग्वेद द्यानन्द्‌ मध्य वैदिक यन्प्रालय अजमेर

# यजुर्वेद 9 | || | ऋक्‌ अथवेद सायण भाष्य

षछठाष्दोग्य उपनिषद्‌ १० छिबशकूर जी काभ्यदीथं

मानन घमं शास्त

मुस्एति साख्य वैशेषिक वेदान्त श्र ष्य

#

१० न्याय वशषिक सांख्य

स्वगेवासी प० भीमसेन शर्माजी। , ? प० तुलसीराम जी आनन्दाश्रम बूना ११ 9)

श्रीप०्भाय सुनिजी काशी

स्वग पण भरमुदयाल जी

[ कूटेश्वर यम्न्रालय, ब्ब]

५-1

११ नेशे पिक उदू माध्य . शद » अंगरेजी भा्य १३ » सच्छठ माष्य ,

१४ सगवरदूगीता रदस्य _ ` -> तिलक म्राज

१५ आपटे का कोष शदे वृ्टद्धिष्ण पुराण

श्रश्री सदूभागव्त पुराण

१८ मदहामारत

१९ बृहत सिता

२० अष्ान्याया

२९ शास््राथं प० गणपति शम

ओर श्री प्वामा दृशंनानन्द जी

र्‌ स्याचरमें जोव विचार पदै 3

निण'य सागर य०#

स्वामी दशं ननन्द जौ पाणिनि आक्षिप्न प्रयाय श्री चन्द्रकान्त जी वकीलंकार , लोमीन्य 1 ~ लोकमान्य "प०' बालगगाधर

आपटे, बस्वई

येकटेश्वर य्‌० बम्ब, ..

॥ि ^

1] [| वेदप्रखछश ष्टग) ,. प्रकाशक महाविद्यालय ञ्या-

लापुर [ हरद्ार ]

स्व० प० भीमसेन शमौ जी श्रा बा० श्यामयुन्दर लाल जो वीर प्रोफेसर वकील मैनपुरो 1 स्वामी दशेनान्द ली कूर" दष्ट {इसका 4

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९.

दशनानन्द गम्थ गृह प्र ६४३ से ६३० तष आया है 1

गोङलचन्दु जी पीत

, २५ बता मे जीति भिर श्री प०्वी० एनन्शमा जी २६ + + '# निणेय »» + गमेशघरमाद्‌ शमौ जी 7 फरुखावाद २७ दयानन्द प्रकाश ' +) म्बामौ मत्यानन्द्‌ महाराज + +) # लादौर २८ पि दयानन्द फे पत्र जर ° भगयदत्त जी बीर ए० धिक्ञापन द्धि्तीय भाग रिसचं स्कालर डी० ए० षी | कानिज लाहौर २६ आल्म-दुशेन मदात्मा नागयण॒ स्वामी ¡ ३० मत्या्थ प्रकाश वेदिक यज्चालय अजमेर ३१ विकासवाद्‌ प० पनाय गणेशः सारि

जी [ प्र० सद्धं प्र० यन््रा० | गुरुकुन रागडी हरद्रार ||

` बैक्ञानिक खेती श्री मता दहेमन्तमारी देवी जी 5 लेखनङ 1

` मेरो कैलाशन्याघ्रा # स्वामी मत्य देव महाराज ¦ ३४ अतत्र विक्षान , # प० रघुनन्दन शमौ जी

॥॥ . { प्र° शुर जी धस्लभदाम

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क० वद्गादी बम्ब

३५ दा० खर जगदीश चन्द्‌ श्री सुख संम्पतिराय जी बसु ओर उनके आविष्ार भण्डारी ( प्र* श्री मध्य भार्त पुत्रक पएजेन्सी इन्दौर ) ३६ ्सबन्व जसो भूषण गूल्य॒ राव राजाश्री रमुनाथसि मारिषाद्‌ जो ठेकाना जीबन्द्‌(खामेश्वर रेल स्ट शन) जोधपुर राजय के पातेन इस पुष्तक को देखा था। स्कूली पुस्तके" ५० अन्थशवौ या अतुबाद्क

३२ 0088९810) {6880179 ९७६५७ 0: 8 का खद्‌ भसुयदि ३८ पविषप्प१९ इष्वर प्रि 1 अनुत्राद्रू स्वगे वासी धाव माणिक चन्द्र जी षी० सी० टी° (प्राघन सिटी आय सर्माज लखनऊ ! )

२८ द्वर्४्ः 9धण्प्‌ (० |*] [गाक8६०१३ ७९. एप) ) नृप 8५४०

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` छ'गरेजी पुस्तके"

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'छुपाप्वतताग्पाण्णययष बागत्ा-कूख भूषण, सनातनधर्म कष स्त्म, क्षाध्ु ब्राह्मणो पर श्रद्धा रने वाले , च््ा भ्रमी, दे ग्लो-संस्रत फूलचन्द्‌-बाणला हां स्कूल, धाथरस फे सोक्थापर परर स्यश्धारखक, ध्ीमाच्‌ रायदहादुष सेठ चिरंजी लाल जी बानला कः कर्‌ शमर्लोा मे सादर

समर्पित

मङ्गकानम्द्‌ पुरो

केक किदे कके विदय कको ककं कको कको ३3. अक कड किक कक ककन कोते कठो जोक

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` परयह्गलप्रन्थमाला "की पुणो शो द्रपनि लिए (जिन सञ्जनं ने आधिक सष्ायता दी ,६ै, उनको 'शवश धन्यवाद रन "सरन क्षी नामाबलो परिशिष्ट मे प्रकशि कर ,भ = & 7 ^ श्रीमन्‌ वण केशव राव जी जज दिको तपूव शरान ऋआमये' समाज दैदेपर्बदि दक्तिण हमे विशेष बार्धितणे कर्यो$ि जिस ` खदारती' से ` आपने इस पुर ' के प्र्कोशनि भं स्ायता दी है बह सराहनीय दै। ^ £ 1.० २-8से पुष्क को ओने हैवयबाद्‌ से प्रवाप प्रोत के मनेजर ओर टृस्टी भरी प० शिवनारायण जा मिश्र केषास भेजा था, आपने इसे कमशल प्रेस मेँ पवा दिया मिश्र जी ने जिस प्रेम भौर शद्धा फे साथ पुस्वक अकाशन मे सष्टायता दी, उसे लिए आपको घन्यव्राद है ३-लाला ` भगवानदास जी रात फमशैल प्रो कानपुर प० किशोरीदन्त जी शाघ्त्री राजये, नयागज, कानपुर को भाषा की अञयुद्धिया ठीक करने के लिए धन्यवाद है 1 विस्नीव श्वान्तिपरिय द्विवेदी शशी निवासी, भौर ₹० प्रेस पिरव देवीदीन को स्ायठा लिए आशीवोद्‌

२४

४--श्च पुर्व भनेड प्रमाणो शौ ग्बोजे मे मे स्या भी प० लक््मीराश्रः रामो" उप्येश दैदराषादु दङिण ( आनरेरी प्रषन्यशतो, श्री देवीदत्त संश्कव पाठराला,

रा्वपुर सिकन्व्रषुर्‌ भि० इभ्नाव) ने की दैः, अतरः माप भौ धन्यवाद के ष्रत्रहै

४५-जिन प्वर्ञो से भने इस पृस्वकरवना मे _संशयता ली है, अन्त मे मै उनके लेख, अनुगदक, प्रकाशकं महा- शयो को सहस्रशः घन्यबादे देता हं सच तो यष है छि धनि, उन की प्रन्थनाटिद्या से कुञ्च सुमन चन २,-कर, पक गुलदस्वा तैयार भिया रै जो भाज, प्रसुव हप मे। घापङे श्वामते रै। ~

}

, लेखक

1

` प्रस्तावना 1

[ र्षु +

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[ननन मी = ९} 1 कि ।)। \

यह पुश्क आप ष्ठी सेवा में उपस्थित ` शी जाती है। इसकी तैयारी की (राम ' कानो सुनाना कदाचि अरोचक जहोगा < 73 {7 ' {सवव १६७२ विक्रमी मे सीवोपुर '( अवध ) , आयसमाज षापिकोतसव्र में मै मी शरीके था)। वहा शद्भा--ममाघान कै अवसरे पर एक मदाशय ने प्रश्न किया कि क्या पृक्त जोवधारी है"! » उत्तर मने ही देदिया कि हा)" प्रशन कपी शरो तो सन्तोष हौ गया, - परन्तु उम समाज ' $ ' प्रधान भ्री रामानन्द जी ने यह्‌ घोषणां कर दी फि ^ समाज उपदेशों | श्त विषय पर भत मेद है सलि मं प्रश्नोत्तर को संमाज ष्टी मोर सेन। समा जाय1' 7 1" 'इस घोषणां का परिणाम, जेता कु "होना ।वादिय `था वैसा ही इभा अथीत ' सी समय ए, सनातन धीं ' भरन क्तो मे चकत? श्रधान जी, फो जदि हाथो लिया ` ओर. ४हा षि भाप कुष, ठीकठिकानामीहै जाप. कीवेदी से संन्यासी उत्तर ।देतेऽरदै -जौर आप कट देहो फर पकषत

हि च्म,को म्यं समाज का ओरसेनमाना,जाय इत्यादि! = ल्फ ५५ * ष!

-९ 1

यद्‌ शोचनीय दशु देख कर मेरे मन मे वडा खद उत्पन्न हुआ ओर मनि अजुन्धान करिया तो ज्ञात हा $ पसे कष बिपय हँ जिन पर भावं सामाजिक पिद्रानों अभी मतभेद दै ओौर अगर उनका निय होःगया तो विपक्तियों को भाय समाज्ञ पर खटा उढाने का ¡उचित अविमर मिलता ही रहेगा, इसलिए मेरा यद्‌ विचार द्दृ होया, हि दमामप्फ़ विय का न्तो पूरा अनुमन्धान . कर डा ^ बस्तुल. चवृत्त-क़ा जीवधारी होना;ठीक हैया लष्ठ १, „“

- इप्री अभिप्राय से रनि,.पत्त भौर्‌ ,रिप्न कौ, सारी पुस्त मृग भ्ओर उन, सथ को- पठने तथा यथोचित मनन, ,कएे पुर्‌ इसी परिणाम परर पटुवा किंवृत्त मे जीवक विद्यमान दोना .्री प्राचीन.-ओौर घवौचीन-निद्रानों के -युकयोऽमरमाणों तथान्यो , से, निद्ध है ,

निदान इस प्श्ठीर ऊे परिश्रम से सेनि सर विषयं छी प्तक कापूरार सामान्‌ तैयार केर लिय) पुस्वक्रातों सैयार हा गष" परेमबु इसको स्वत -परषाशित करना "मेरी शक्ति ` से पयार था; इसलिष सने कटै सभा समाजो वथा पुस्तक प्रकाशर्का से सन्न च्यवदारं! किया पर सारा परिम स्ज्ययंताया प्‌ः," ~ २--इसी- वीच मे घटना प्रकार घच्वि दई पुेफ | लिखे (जानि पर ्रीमतीः आर्य प्रतिनिभि'सरभा सयुक्त पान्त मै इसश्षे मगवा लिया ओर्‌ बरन्दाजन गुरुषूल के युख्याधिष्ठातो

{ = 1

आरि नार्सयण प्रसाद्‌ (र्वतमीन पा नारायस स्वामी जी) का सेवा मे सम्मति' प्रकदिनार्थं 'मज दिया सवंत भक्सा जी ने मैरे लेलो को कर जो सम्मतिं प्रकट "की बह सरमां पश्य 4६ तार, अक्टुबर १६१८ दरौ सुमे सूचितं कौ जिन्न प्रतिं 'किपिनिन्न प्रषषरहू- `? " ~` भीमृहीं आयं प्रतिनिधिं सभक योग्य मन्त्रीजाकीः अश्जातुसाररमैने ह्वामी मगलानन्द्‌, नो पुरी छत £ वृत्तो मे जीवः है» नामवोल्ली पुत्तकूको पाहः] '' , » # पुस्तक. बहुत खपयोगी दै, युक्िर्यो ओर प्रमार्णो -दोनों का,-अस्ला ."सब्रह क्रिया गया, है, इस चात क| पूरा ५२ इद्योग-'कियाभाया, है छि - को आत्तिप इस सिद्धान्त चिस सर दनो से वाफ़़ी नरह्‌" #केवल एक ष्ीगदोप पुष्क मेह भार बह 'यद्टःछि भाषा, बहुत सराव ओरुद्धो से भरी ६.२६ साम भुन सवुण, करे गु क्षती 1 , + , १4

गरुत्‌ 4 | ‡-( हर) न° प्रसाद नेष्म्

"15 रन १९१८ ^ 11, स~. मोर “1 “लि समय यह्‌ पष्ठफ! लिखी गयी यी छस्रासमय से इस ममौ श्री नयोन युक्ति तथां भार्ण, का्मप्ावे कर दिया

भर & \॥ (मृगलानम्द्‌ 2) शाहु = नो

} सम्भव भाषा दुर्त कराई

14 1-> $" प्न प्रदो गप्र मं गलनन्द्‌ ॥^ 1

{ ०१९ }

, , श्रव, पुस्तक को ऊद्धपाने क" प्रत, सा, को अन्दर वेट ; मेँ , उपस्थित छिया गया { परन्तु निगय हुमा कि समा इस पस्वक,को नदीं छपा सकती » म्यो. जम छिस्भाष्ी फे. पक प्रतिष्ठित साय.ने इमो बहुत्र, उपयोगी मान्‌ लि दै णो पुस्तक छपनि,से इनकारी क्यो (पमाने, तो मेरे इम भश्न फा कुष्ठ उर दिया, परन्तु „उसके एक सम्य ओमान्‌ , प० गगाप्साद्‌ जी एम० ए० दद मास्टर डम, एण्वीर श्कूल प्रधान आयं समाज चौक प्रयाग ने यो 'ववक्लाया-- ,

' ` आप की पत्ता 'समाकी जओोरसेषप्तेका्ैनिष्ी विरोध्किया था मेरा कथन यष्ट था जव कि समा के सर्य मँ इस विपयप्पर दो प्त तो एसे, फगढालू विपय कौ पष्तक को छपा" फर मभा श्यो पक तरफ दिगी दे देवे! ह्म से दूसरे प्त वार्लो मेँ मनोभालिन्यता,आ जायगो "1

सभा'ी अन्तरा वैढक कौ 'पयु क्त व्यवस्था सुन कर सुमे वका आश्चयं हआ 1 अगर पेसे विवाद्‌ गूहत विषया की छवानवीन 686 ८ाण्डकां काम समाये" करारपगी तो पिरवे कंसे वयद्ोगि सभाङ़े वड धरूरधर' विद्धान्‌गण { भेजुएट सादवान ) यद् क्यो नदीं 'विचेरि करते कि" अगर

मंगढ़ाल्‌ मामले सर्याहए तो 'फिर किस सुद से सारि सस्मर कोवेदिकधम में भानि का निमचरण्‌ (द क्रते ह+“ संसलमान | शसा, सन, बौद्ध पारसी आदि जव कमी देसे दी जटिलःरश्ना की

{२ 7]

भप सि जंचर्पडताल करेगी ' तो' उनसे स्या यद क्ोगेः कि मे जीव होने छे प्रन "पर मारे 1 यश दो पत्त है अवः शत विषयं धर हृं "कोई विचारं नह कर सकते क्या आप इष उत्तर से षे मन्तुष्ट दो जाये ? अगरनर्हीतों फिर क्या समाजो वथा सभाओं का यह्‌ परम कतव्य नषा है कि भन्य कायो ' कौ अपेक्षा सवस "धरथम इन्दी ` विवादास्पद विपर्यो शा

निग्यायाकराडालः ' ` †" , 3

` षा! यह्‌ प्रश्न होसश्वा है कि इन मेगङल्‌ ' विष्यो को कसे निषदाये उत्तरयह है कि सभा को उचित था फि मेरी पुस्तक शो पेसे रिमाकं 7९900871; ( रिप्पणो ) सय हवपवा देतीक्ति-धृत्मे जोय य। नदीं इत विपय फा प्तमा ठी' निजी कोई' सम्मति नदीं है समा इस विषय गै भोर "से उदासीन दै, अतः दस पुस्वक को सभा बिद्रानों के मिचाराथं प्रकाशित कराती हैः कयो कि समा कषक सभ्य फाकयन दैः क्ति" लेलकूने “य॒ क््विर्यो प्रमाणो का अच्छा संप्रह्‌ं करदियादहैलौर पुवक्‌ दुत खउपयोपी र) अगर इस पस्तकं फो पदृकर विपष्ी लोग यष सममं षि ब्र इन चुकति्यो माणौ का] सराठन कर सकते दै घोष अपना लेख सभा के पासभेज दै भौर यदि- व्‌ उपयोगी मानाजायगा ता समा दृसरे सस्ारणमें चन को भी छपा वेगीभ इस श्रीर्‌ दस विषय एर छारी वाद्‌ पिवाद्‌ हो कु

| 1,

सिद (त्र निष हषर सवकोभसगृमतू 1 ५. कृत, हे जात पदे. शिमाम, साय सुमा प्री स्वक को शार, षृ देती वो ,वह ,जन्‌।...छतेद्य (पालन कूसने बाली मातो सास

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+ षश ` नत

# $---सव ओर से निराशो जाने प्र मेति अपनो पद पृषक्‌ सनौर अन्य पुस्त को छुमाते कलिय पेशगी), पस्य तथा दून भ्राप्त करने फ़ ठान ली भौर दस प्रकार दावाओं छरी. मृहायता सरे ( जिनको नामावली परिशिष्ट में छपी है ) यदह पुस्तक आः

त्रपेपश्चोत्‌ अव प्रकाशित हो सकीहै।

, पाठक ! यष थोदे में इस पुभ्तक के प्रकाशितः होने;क्ता इतिष्टास दहै! सुमे आशां है कि आप लोग,हस पुप्तक्को भपना कर सुमे आगे.ओर भी पुस्तकरे' लिखने ' ॐ, लिए।खरतादित करेगे पुस्तक केसी. दै हमक्रा निणेय तो साप स्त्य कर लेगे ।- ए. 469) (4 1

, ने '्यथा सम्भव दस वाव की कोरिश-कीदहै-कि पुस्तक में बिपदिर्यो के भमम्पूणं प्रश्नों के °त्तर, दै दिये जांय सन १९१६ से आज (९६२४ ) तक अतिक , स्थानों ४पर॒धूमते शृतो कै. जीवेधारी होने पर व्याख्यान वेने दथा +स्न,विपय पर हने वाली शद्धा के,खमाधान कसे से जो जो निके निकले शस पुष्ठक में उत्तर ,सष्टिर सम्मिलित छया ग्रा है विस्ली के सद्धं यचारक मे ने दसी अभिप्राय का एक निक्षापन

“,{ २२ ]

चछपापा, याः जिन्‌ लोगो छो इस, 1 बिपय {प्र इद्‌ शङ्क्य सो व। नि नैजे इए, सूचनानुसारुष्दो सत्र नगण ~त रजो शद्धे; को गीदरी उन उत्तर भूवं सेह लिघे "जा चके ये। पुरक छपते ४२ कदैनवीनशङ्काये घुनी गहै, उनको+भो उत्तर सदिव सम्मिलित्र ˆकर).लिया गया कदे; छपने योर्थ चति

प्व छप ,जाने पर पाद गई, मेने उनको भी परिशिष्ट में स्थान दे दिया दै -अगि जो .शङ्क्ये सुनी जायगी उनको पुन- गति में शामित करने का प्रयत्न करल रगा

: ५--इम पस्वक मेंमेरी निजो कोद सामिप्रीः नीषि प्रथम खण्डे ता अगरी पुस्तर्छा के आधार पर.लिसागया है मौर अन्य ` सरो भे, "शालो 'के प्रमाणो कींमरभार है। दां -दीश्न -टिप्पणौः प्रां "विषयः को सरल वनाने `को यया सम्भव ।कोरिश की गहि /* ˆ '

{, जा अन्य विद्वानों के वाक्यो प्र चिसी दीका रिष्पफी-की \ भावेश्यकता पदी है लक्षमने उन्‌ -टिप्पशियो, के -अन्त से .्पना निममी दे. दिया दै। एसा रिवान्नं हिन्दी पस्तक्नोमे, कम्‌ पबा जाता है ञव अगरी पुस्तको, मे, यहु प्रणाली. वदी

माषघानो से वर्ती जाती दै।

4 कल'हिन्दी पुस्तर्को के लिखने . बाले सन्जर्नो कीषे

प्रवाहे से पाटर््ो-को-कद उलमनो मे पढना पदो है (मै सवय धुत वारे अमलो मे पढ़ा हू ) खास कर }जिन विपो मे सक्त श्लोकों का उद्धरण होता है भराय हिन्दी पुस्तको मेँ उन मर्गो अर्थं ओर शूल्थकतां फी सम्मति तनी मिली जुली 1४ रहती हैक@िजो पाठक यष्ट पता लगाना बाहे छि प्राची

इदधरणो का आय कदा तक है नौर ननीन सून्थकतौ मह।राय

(प { रदे 1] = |

की रायंकषयां है वो यद्‌ "जानने मे ` चड़ कषिनादे पदौ टै। सस्कृतक्षः युरोपियर्नो "(मों मूलादि) ' की, प्रशस्ाक्षवि बिना नकं रह्‌ सकते के मूल पुस्त से जा भपनी ओर से एक शमु भी अधिक कना चाहते प्नौरन अपने -हस्वाकषयो ट्र स्पष्ट छर दतै है यई प्रणाली ` अघुकरणीय है

जंहा कदां कोद टिप्पणी अपने! हौ वस्य पर वेना पढम है बां हस्ताक्षर नी किया इस से पाठक गण दूसरे के द्धरणे को जो दम पुस्त में घुतायव' े' साथ है श्रीसानी सेमे! कर सकें

६--अभ्तिम स्वेदन मुम यष्ट करना हकर इस वात फ़ वहुत कोरिश को गर @ पुष्तरु मे य्य दियो र, परन्तु, मी छु गलतियां द्यी गर, जिनमे छव, भारी भारे अञयुद्धियों का “नुद प्त” परिशिष्ट में जोद दिया गया पाठक शुद्धि पत्र से संशोघनकर के पद््‌ले तोठीक हेष कस क्ट लिए पर्णो से क्षमान्ार्थी हू) सशादै रि साप विषयं टी गम्भीरता फे सम्य माषा य। भूक की गतत तिरो छी परवाह करेगे इत्योम्‌ शान्विः

, मायंसमाज कानपुर ~ स्वं-दितेषी 1 धी० रोड, , 2 | क) मंगलामन्द पुरी

ता०९६ मार १६२४

भूमिका ( श्रोमान्‌ माननीय -परिडत सेश्वर राजी जज हाईकोरं हैदरावाद्‌ दिए लिखित )

9

वास्वव मे इष पु्वक्‌ फी भूमिका राव आत्मारामजी भौवा निवानी लिखने बाले ये जिम योग्यता से बे इस कायं फो मम्पाद्न्‌ करत, आये मापा के सेवको मे वैसा दून कोर ममे नही दिपलाई पड़वा धवीचीन निज्ञान- शास्त्र रूपी यन्त्रो के दाया अजीन आयं सभ्यवा फी कानों चमङ्ाले रत्नों निष्ठालने मे जही उनकी निपुणा देखी जाती दै, कैसी ब्रुव हदीक्म लोगों मेद भौर दसी निपुणता फे आधार पर बृ्ठो में जीव कं अच्ित्यष्ो षर प्मापस्सिद््‌ कएने बालो इस स्वणमयी पृष्व पर जिस योग्य रोति से राब जी सु्षाणा लगासक्ते ये युको खेद दै कि खस योग्यता से मै इस कायं शो न्ट कर सकता | राब जी के बहुत भधिक बीमार होने के कारण गृूर्थ-ष्वौ ने यद्‌ कार्यं सुम खे सम्पाद्िद कराने ङी भभिलाबाकी। ,

दस काय-भार का मेरे तिर्‌ पर पद्ने का एकं ओर

कारण मी है,ऽसे मै च्य लिपे व्रमैर नदीं रह सफवा। बह यह्‌ हरि इस पुस्तक का उतच्चि-स्थान वही हैजोमेय निवासस्थान है इस पुस्तक का वीजारोषण की मी क्यो हज हो, पर इम का तर्ठीब दियां जाना ओर वतमान सूपे साना हैदराबाद मेदी हया! इस यात काम दैदरा- भाद्‌ वास्यां को हरं समय ` अभिमान रहेगा फि पक परि धराज ' सन्यासी शो लोकोषकोर'के छ्य मे प्रवृत्त ने छे लिप हम स्थन ओर सायत दे सकते। ' 'जे्ा' किसने भमी लिखाहैक्रि इस पुस्तकफा भादि स्थानदव्ी है जा मेया निवास-ष्थान दै, इसगिषए यमे दन पुस्वक के आदिम स्वरू को देखने का भी अवमर {मिला जव सने स्वामी मह्धलानन्द जी महायाज के सेचित भाधुनिफ लेज्ञानिकों के वकीभ्नित मव' ओर वेदादि शास्त्र ढे प्रमाणो फे" समुदाय फो दध्ना था, उसी समयमे इनकी षिद्त्त सोर सत्य-शोधकर्ता पर' आश्चयं हुओथा "फिर भी समे सन्देहं था छि' वे अपने क्ञान-भण्डार 'फे इन शा फलो "मालिका ङः सुप मे आये भाषा परेभ्यो" को धारण कगने ऊ) लेए इतनी जस्दी किम्‌ प्रप्र !द सङगे, प्रम स्वामो जी महाराज कफे परिम ओर एकागृता- ती धन्य कि ' यष्ट, -शभः दिनः हमे इतनी शीष देखन्‌ को ~ मिल गया} कणं ¬ ~ ।, =,

स्वामी, जीं महाराज ने अपती, पुर्तक्र को चार हिस्सा

{ २६]

मे भिभक्त क्रिया पिना निभाग उन्दने तकेवाद्‌ के सम पित सिया. ह। इस भिमाग में उन्दानि अनेक वन्यति शास्त्र शोध के आविष्छारो को सूध्ररूप से 'संग्रहय्ठ च्िय भीर-छन वारो मे यहं दशने -की कोशिश की है कियन - स्पतिर्यो भं रेषी विविन्न विचित्र वंति "जो"'दैखी जाती है इतश्च स्पष्टीकरण ओर फिसी पौर पर न्षी किया जा सफत।! मिवाय श्मके क्ति वक्त में जीवासा के अस्तित्व छो माम्‌ लिया जाय. 1 , , दूमरे भाग में उन्द्नि यृ दशौयादै क्रि जिम सिद्धान्त

को वे अपने असण्डनीय तक से प्रयम भाग मैरस्यापित रर्‌ भये है , , वह्‌, आप्रप्रमाण अथीत्‌ अनेक विद्वन म्यो से भरो मिद्ध होता है, इस भाग मे उन्हनि मष मारतादि मवं मान्य भरन्थों के, पुराणादि सनातन प्म कै, ओः वेद्‌।दि प्राचीन आप-गृन्थो फे प्रमारो यह दशानि का प्रवल किया'है कि दन भर्न्थो फे कर्ता मी 'ृक्तोँं मे जीव के अस्त्व को मानते वाते थे) द्मे के सिवाय अनष्ट इधर द्वारा , उन्मि. यष मी दशाया दै % मवि दुयानन्वं रोस रुरुदत्त, लोकमान्य ` प९ वाल , गज्लाधर तिलकं तथा | पण्डित मिनि सरीसेआधनिफ मरतीय विद्धान्‌ भी सी सम्पति फे है 1

¢ ।रीसग मान्‌, इस, प॒स्तक्‌ छा भेरी. समक. में सव से ¡ अधिक महत्व फा है उत्त मे जीच. मान सेना, चट

= 1

#

की. वद्धि हो, उको तौर पर सुमः पूणे भाशाहै प्रये आयं षां आष भर किसी लिये नहीं तो केवल ज्ञान प्रापि $ निपभिच इम पुष्वक शो षर पद्‌ गे ओर प्रन्थकत के प्रयत्नो कोसफलषरेतनो। = , , , + ^

अद्‌ पुष्वक्ठ हिल्दो भाषा मे अपने तरह खा पला ओर भप तोय रसन .ौर प्रस्थे भाग्यं पुरुष के पुत्तश्चलय मे

{05 होना निकष चरूरी दै। ` दपकद्० केशव राव # {१२ अप्रैल १६२४ , ४८ 6 < "जंगम पठ

~} , 0, 8 ~: 4. + 11 } # ~ # ॥; 1५ ~ 711 0) 11 ६५ ५1९ ~ # 24 नः = 4 3 ५4 ४.४. 8 #< "वु ८४ ^ 1 1 ~ ++ ^ ण्य +र 1

(न 8। ^ * ॥) 4 [च { ~ ८५ ५. ~ 7 = ~ 1 ५. १, #। } 1 & ~

पहला खणड 0 तकवाद्‌

९. & शि < = ८१ शौ , #॥ [किन षि! भरो३१९्‌ | ०५ “म (क न= +

वक्त मे जीव हे ~~

पहता अध्याय। £

, ^` कक मारम्भिक वातें।

. {पहला अलुव।क

[री ५, #

पधृक्ञःमें जीब टै या नही, षस प्रश्न पर हम ,दो रकार से बिचार कररेगे--एक तो युक्तियों ओर तनँ दारा, दूसरे

`य प्रमाणो द्वारा प्रथम खण्ड में तकँको षी

भ्रसयुत करना वाहते है, स्यो भाजकल लोगों शी प्रवृति शकप्ान हो रही है। दूसरे. खण्ड मे दम वेदादि रे प्रमाणें को दशोर्ेमे। ओर तीसरे खण्ड मं -बिपक्तियों आपो शर्‌ सुनारयेगे 1 फिर चौथे या -अन्तिम खण्ट्र मे यह्‌ जिचार ठको फी शेवा में प्रस्तुत करगे अगर्‌ वृत्त मे जीद का शेना मिद्ध है लो क्या .दम मनुष्यों फो उनके फन, फूल, डाली,

यृ मे जीव रै १/१

~~ ~~

---^~ ~~~

पत्ती मादिखने से दसा का पापलगताष्ैया नहीं अच्छा, अप्र इस प्रथम.“ सकेबाद्‌ यण्ड मे हमे युक्किया प्रकट करनी. वादये कि किन दलीलो से यह याशि ह्ये सकता है क्षि कृं मे जीव दियमान है हम यषीए वनस्पति विद्या { बोटानी एण) की कुव स्कूली पुर्षे भं से यथोचित युक्तिया दशोयेगे शपि-विद्या तथा कै अंगरेष निक्ञान-तेत्ताओं की पुस्त से अनेक बिचार को प्रस्तुत करे गे ओर षडे रोचक, मनोहर ओर आश्चयदायक शयो महात्मा, डाक्टर, सरं जगदीशचन्दर वयु महाराज कै अन्ेषणो का भी स्तय में चरणेन फर देगे निदान्‌. युक्तियों की जह तश सम्भावना है, षाठकग्ण इस प्रथम सण्ड मे उनकी त्रुटि पायेगे ओर हम दावे फे साथ कद सकते फिविप- विरथो कीं भी अगरं वे पक्तपात छोदध्टर हमर बार्तोँ परं कान

1

देगे; ` तो ` अनो मत ' परिवतैन केर देनी पदेगा। ` ^ ~ 4 {1 2 + णि 4

+ ~ ~. * ^ ५८२

- ,“ ` ऋस अवाक = :, » --

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हैमाय सोधष्य विर्यं यह है किप वृ जिदं इस से ' हमारा -आषिप्रायः अभिमानी ! जवः को है भ्यते हम लोग आनांगमन.सिदान्त' के“.माननेर्धीले पेसां निव!

आरम्भक वार्ते।

~~ ~~ ~ 1

रखते है फि हम मघुष्यो के जीवात्माये अपने कमौलुसार ॥} कमी पञ्च, पती शरीर पाते ई, सो कमी वृत्त की मी { योनि मे चले जाते है! अत ज्ञात रदे छि एक प्रमे जद से फतगी तक्‌ मे उसा एक जीवार्पा मानते है। | से मातुपशरीर- मे एक अभिमानी जीवात्मा इसका मालि, प्रमु या ' रजा वनां वैडादहै। जो वृत्तो मे अनेकों जीव जन्तु घर वना कर जा कैठते दहे, या स्डे फनों मे जीं 1 कहे पड जाते है या गृलर के फल में जो रैकदों मच्धुड }॥ बिधमरान रहते. &, उन से दमारे विषय का क्रुद्ध सरोकार नदीं) बे बहा वैसे दी निवा कसते हँ जैसे मारि शरीरं भी अनेक कीडे पडे रहते साह कर फोडे आदिं # म॑ सेक़डों कीडे पे हए प्रव्यक्त दीखते ओर जो अलु {1 शयी जीव कह्लाति उन से भी हमारा कोद सरोकार , नहीं है 1 पाठकफगण उनका हाल तीसरे खण्ड के अध्याय-- ' "बीज मे अनुशयी जीव ”-मे पदेगे

+ निदान्‌ जिस प्रकार' हम अपने मादुपी शरीर फे मालिक ¡ जौबा्मा उसी प्रकार वृत्त फे अन्दर एक जीषात्मा उस ` सार शरीर का मालिक वना वेठा रहता दैः जो उसे जिदा { .( हय भरा ) बनाये स्पता दै इसी मन्तञ्य फी पुष्ट दस प्रथम खण्ड में वैज्ञानिक युक्तयो से ओर दूसरे # तीसरे सण्ो मे बेदादि फे क्षणो से करेगे 1

4

“४ {वृत्त मे जीव दै १/१

~~~

| +

तीसरा अचवाक्‌ ` , ण, | , यद्यपि दम इष प्रथम खण्ड मे वैज्ञानिकं ( लासक , पाशचाल्य विज्ञान ) की, युक्तयो को भरस्तुत, करेगे, ` परर रह्‌ बात स्मरण रयन योग्य दै फि जीवातमा की परिभाशे मे मरि शाखो ओर॒ पातात वरश्ानिकों का' भारो मद मेद टै जहा एक शरीर ( मतुष्य, प्रु या यृ) मे ष्क जीवात्मा को उस सारे शरीर ठा अभि मानो ५--मालिक, भभु या राजा मानते, बदा वै शै संथिर दक णक वृद 'को सेदो जबालां संमू, मान रद दै ˆ भव वे लोग वृतं के भी पकती पत्ती मे जीवो का होना ( ओर शायव्‌ एक,२ पती को जीवो का समूह्‌ ) मानते इसलिण पठण कृष्टी भ्रम भं पढ़ जाय, कर्यो दम उन कनिका, कौ खारी वातो को स्वीकार करने के लिए तैयार नदीं मास्‌ ,अभिमाय इन वैक्ानिक युक्तियो फो उपस्थित करे से केवल यद वशोनि कदे कि पराचीन पिय का विद्वान

¢ ~ ` " > च्म-दरीक यन 215८08९णु6 कति दमन भी सधि" > रेगनेव्ति व्यक्तयो को देखा(दै जिद घे' पपच उादख सोः पमजीव मान वैठे दै

कल भारम्भिक' बाते ५4

वृत्त ॐे जोीवधारी होने का ठेसा अङाटथ जर यथार्थ @ भानि विज्ञान ने भी उसडे अगे सिर मुका दिया है। ` पररन--अगर बिज्ञान का यह्‌ निणेय ' «कि शरौर खसं जीनो फा एक समूह दैः युक्तयो से ठीक सिद्ध दो रदा षो भाप को उसे स्वीकार करने मे क्यो एतराच टै? ` उत्तर--दस प्रश्न पर बाद विवाद करना हमारे इस स्वक का षदेश्य नदीं दै «शरीर अनेकों जीर्वो का समूह्‌ दै», यह विज्ञान का निणेय कष्टा तक सत्य दै, इस प्र तलक्लानी किलासफर ) लोग विचार करगे र्मे ती इस पुस्तक मे फेवल यद्‌ द्शोना दै करि मलुष्य या पश पत्ती की सारृश्यता वृत्त भी रखते टै शाखो ने जदों मालुपी-रारीर का एक अभिमानी जीवात्मा माना दहै, वहं शत.शरीर का भी एक अभिमानो जोव माना है मौर विद्वान दा भानुषोशरीर के एक प्क रवद को अनेक जीवों का "ममू मानवा है, बहा वृत्त के भी एकं एक पत्ते "को सकर -जीबों से भरा हमा मान रदा है पेसी 'दशा म॒ यह निषयं निनिबाद दै! अथौत्‌ जिन्दे चिन्ञान का निणेय भिय“ ष्टो, वे वैसा दी मान्ते भौर वब या

ममे या मुक चैते शाघ्ीय श्रमार्णे को प्रमाणिक माननेवार्ो फो वद रिम हो नां सकना।

एत मे जीव दै.१/१।

~~~ "----~-----^~~^~-~~~~

सानना होगा फि मानुषी शरीर लाखों जीर्रो-क समूह दै) { ऋसी प्रकार वृप-शरीर भी करोद्धो जीरो .से,-तैयार हो सङ है परन्तु मारे साथी मदाशयगण ( वेदो, शारो, पुराणा | सादि को माननेवाले ) का ,मन्तन्य यों दोय कि निव | भकार हम एक जीवात्मा शम मानुपी शरीर में, कहे सी प्रकार व्रष्तशरीर मे मी एक जीबात्मावैषा है) भरश्न--माप जब कि विज्ञान के निणेय -फो धर पृ नदी मानते सो आप काक्या हक है कि उसी युक्तिं || षा यहा च्छे करे लगे? , ' , उन्तर-नविज्ञान की जितनी बाते हमारे शाखो -के साध पश्वा -रपती |, उन , प्रकट करना इप्नलिए उचित ओर ाबर्यफ दै कि तक॑वाद के प्रेमियों पर हम यह प्रभाव , डालना चाहते हैँ फि उन, के, तकफ़ै ओर युक्ति मी मार पत्त के पोषक दही है (> ^ } ,अश्न--पसन्तु विन्नान की यह वात किं ङ्धिर काण "एक पद्‌ जीवो से भरा पडा है , आप लोगो को , क्यों अभीष्ट, रदी है च्या युक्ति, .अवली ' दूलील भर प्रत्यक्त अमाण से {जो घ॒नं सिद्ध हों ठनसे*भी इनकार कर देना वद्धिमानी द? ¡ ,उत्तर-विज्ञान,फी उत बात. फो मसर के धार्मिक वुद्धि मानं -ते -अभी तक वसलीम नदीं किया है रुधिर मेँ जो ते हये जोव दीप्ते उन्दे हम जीवात्मा नदीं मान सकते

, फु अरम्भिक वात |

वयक “जीवाप्मा कफे लक्षण मौर परिभाप्रा-उन्‌, र; नहीं घटते त्रे बेज्ञानिक तो खून की हयरव को .दी जीवां

है, अव उनके मत में शरीर फे साथ साथ जीव मी भर जादा ह, परन्तु हम लोग॒("समप्त दिम्दू., मुखलमान, ईसा पारसी, बौद्ध, जैनी* ) शरीरान्त पर जीवात्मा का अमर बना रहना मान,रदै हमरे इम मन्तव्य की पुष्टिम युक्तियों की वडी भरमार दशनो आदि, मे पाई जावी है। पान्तु हमारे इस पुध्तफ श्रा वद विपय नदीं है इस. कारण इस पिपयान्तर को यहीं समाप्र करते हैँ {

= "~ ~ + +

शद्धः 4५

चाथा अलुवाक्‌ “वक्त ?-पौधो की कई कि्मोंभेसे एक दै शस पुस्तक के नाम भे वृत्त” शब्द्‌ से हमारा अभिप्राय समस्त प्रकार के नवातात ( एणदर्मा 19 1पण्टव०ा ) से | ` ---__-_--------~~_-~~---

^

श्नस्परमनो कौस का यदी निर्ग हे, कितु,यगद्-को वता

मानताद्योा त्तो वह उमगरी ग्यक्तिगत्ति मति समी जायगी ¢ थापे सीते खयद ( पादपो क,उत्त) मे चध्यायो--““ वुत्त र्मे मिमानी जीव ६१ प्रौर ५८ बीजम) चनुशयी त्नी ६” -- मदम विषय षर थभिक्‌ प्रङाश दाता जायगा ~

(1; 9९. +

"यृ में जीव है १/१ 1

^~~^-~-^-~~-~~^~~~ ~~

उन क्रिमो सूची सुष्णृति मे शद्भि ' दै, अत हम यहा इते श्लोकों को उदूधृत करना उचिव सममते है :- १--उद्धिजाः स्थावर. स्वे, बो कारड धरोष्टियः। - शओषण्य, फल पाकान्ता, बुष फलोपवाः ॥४५} २--शपुप्पाः फलवन्तो ये, ते वनक्पतयः स्ता, ; पुष्पिणः फलिनश्चैव वृत्तारतू भयनःस्छता. ॥५३॥ शुच युम विविध, तथव वृण जातयः खीज्ञ कारड रुहर्येव प्रताना बद्दय प्व ॥४८॥ ( ~ (मच अ० र्छोक ४९) सर्थ--इन सीन श्लोको मे पौधों के अने भशर बललाये गये है जिन्दे एक चक्र भँ नीचे प्रष्टि देवे दै - १-ोषपि जो फल देने षर सूल कर मर जायं जेषे गहू, जौ, चमा, धात्र आदि सारे अनाज म--बीजकाण्ड प्ररो- जिन कै कलम लगाने से लग जाय

दण सैसे--गलाब, गदा, वेला आदि ३--बनस्पति „~ जिन भेंफूलन दी, पर फल लग जव जंसे-गृलर 1 छश जिम फन कल दानो उपर्ज--जंव अमर | जाञुन आदि

गुच्छ गुच्येदार जिन मे शाखा आदि दो

+ ° कुष्ट आरन्मिःषाते -९

मौरनो जङसेद्ी नेक मागमे . चपे- जैसे घीकुबार इत्यादि

--गुस्म जिनमें पूल हो फल, जेसे-गन्र ¦ (देख ), वेव, सरकन्डा आदि 1 तृण जो आप ही आप विना धीज षोये खपर्जे

--अथीत्‌ घास इत्यादि ८" ' . जो दूस सहारे पेल, इन्द लवा या “1 बेल का जावा दै, जेसे-गुरिच, इक पचा, 'अंगुर , सोमलता इत्यादि (प्रताना , मे लताये जिन में सुव जसा निकलता + दै, जेते--कद, , खीरा, खरवृजा इत्यादि 4 \ (+

= } &

वृत्तय जीव है १।२।

" , "` पहला अध्याय ! 1, " "“ "पौधों. की किरसे। | ` प्रथमं अहुवाक

1

==, 0

कटै प्रकार रेसे पौधे देखे जाते है जो अपने अन्द्र जनन के भरत्यत्त प्रमाण 2 देते हि उनमें से कुष्ठं थोडे का हाल यदा. भ्रक्ट क्रिया जाता है .-- 1, “41 (क) सूर्यसुखी + , यह्‌ . पौधा बहुच, चिख्यात .दै सभं ने देखा होगा सय सुखी का पोधा भराव काल में पूरव की ओर मुका रहता दै। उसके पत्ते इस श्रकार धेम जाते टै कि प्रत्येक पत्ते पर सुवं की क्रिरे पूरणे रूप से पड सके कोद पत्ता उपर फी ओर मेड जाता है, रोई दाहिनी ओर, ओर कोद वादे भोर फिर जाता है, जिसमे सव के सव सूयं की किरणो का पूणे से आलिङ्गन कर सके 1

फिर सायकाल में ठेला जान पडेगा फि इस सूयसुली पोषे की पत्तिया पर्चिम की ओर मक. गदे है इत्यादि वर्ते प्रकट करती दँ कि सूर्यमुखी पौधे मे जीवधारिर्यो लक्ण चियमान दै |

सूर्यमुखी! कोः अमरेश ८लेटिन ) मे द्ीलियो दनोपिषम *

पौ की किलं ११

(ना कमजणो कहा जाती है! (ोकमल। /! ` ^“ कमल. वारे मे भी यह्‌ विख्यात टै छि भ्रात.काल पूयं वद्यं होन पर उसका फूल खिलता है ओर पु्यौस्व परे षन ष्टौ जाता पि (ग) विच्छुपौधा। ,. ` यह्‌. एक छोटा पौधा दै.निष्रकौः पत्ती सेने से रेषा कष्ट प्रतीत होता है जेसे विच्छ के इद्धं मारने पर हमने स्वय से पूर्वीय अष़ीका देश में देवा ओर्‌ छक्र कष्ट मी सदन शिया था, जौर स्वामी सत्यदेवज्ञी ने मे केनाश याना ष्ठ १५१२ दसका.यो वणन किया है -- एक प्रकार फे वन्य पौधे के प्तोसे मेरी गेट मानो विच्छ्‌ काट गया, बढ़ी जलन होने लगी यद्‌ निच्छी घास कहलाती है पदादौ मेँ यद बहूव होती है सूखने पर इसके रेशों ़ौ रस्सिया वना जाती है हरी री पतिर्यो का शाक भी लोग-खाते दै » ¦ . इससे पता लगता है कि इस पौषे मे तीक्ण स्पशं इन्द्रिय मौनूद दै'जौ किसी का टूना "पसन्द नही करता, भवं यष लक्षण जीनधासौ ्ी कै टो सकते

~

इस्‌ मे जीव. १/२,

~ (क) पाभना करने वाशा पेड़); आयेमित्र आगरा तौ ३१- मई ९१९१७ १० के अङ्क शठ, कालम पर र्यो छपा दै-- ~ विचित्र पौवा 1 ,, कररीदुपुर जिले मेँ एक ष्टुत पेड़. है जो स्वेरेती सब रवा है पर संध्या होते दी लेट जाता है इसका नमि मषात्मा जगदीशचन्द्र जी ने ("५08 एषण) प्राना के

बाला पेद रस दिया हैः":

' क्षया बिना जीवात्मा की "सत्ता, फै कमी रसा हो सकता [| ॥। ०४ 1 10 + ^~ 7 1} षि ॥"५। “““ ~ '(ङ)बार्येरीपौधा। ¦ ६" "`"

हेत (821 एफ) वर्वर पीथे करी ' पचियां ' 'नोकदार होती जोर नमे गाति (700००९०६) का वणन आया

| ~ {६ ~ = } „> ~

. दूर अदुगक।" ', ',

शाजवन्ती। `

पाठको. ने लाजवन्ती या दुद सुर का छोटा पौषा देसल होगा '\ इत छो अगरी मे - 00087 कते दै

* पौधों की ङ्गे - १३ हस मेँ घड़ी विचित्रता यह्‌ पाई जाती-है फि इसको भगर इमषद या कं