वर्ष पाँचवां ] श्रीरामतीथ गन्धावज्ञी [ खंड तीसरा,

श्री

स्वामी रामतीथे

उनके सदुपदेश-भाग २७

प्रका शक श्री रामतीर्थ पब्लिकेशन लीग लखनऊ रा र्ग हे अपएरद पट शेड का टि०० | ४२3४2 35 335 अ,प- १२८१ बाद्‌ हमारे फुटकर

हो कि| जिल्द्‌ ॥2) सज़िल्द ॥>]

निवेदन

इस बार श्री आर,एस,नारायण स्वामीजी, जो अन्धाचली के अनुवाद के अध्यक्ष है दो मास तक बादर प्ेतों में ख्रमण करते रहें, ओर जिस प्रेस में अन्धावली छपती हे बह्द अपने पुराने स्थान को छोड़ कर नवीन स्थान में आने के कारण फरई दिन तक घन्द रहा, इस किये दो मास के स्थान पर चार मास में यह र७ वां भाग प्रकाशित हो सका | पर अब अच्छा प्रबन्ध क्रिया जा रहा है जिस से आशा पढ़ती है कि शेप तीन भाग तीन मास के भीतर प्काशित हो जायेंगे

यद्द २७ वां भाग एक प्रकार से स्वामी राम के लेखों वा व्याख्यानों का अन्तिम माग है, फ्योंकि अब क्षाई व्याण्यात् या लेख स्घामी जी का हमोरे पास छपना बाकी नईही। रहा। केवल अंग्रेज़ी पुस्तक दाद आफ राम ( का रिश्वत रामहदय ) जिस में स्वामी जी फे उपदेशों से चुने हुए तस्यरूप वाक्य नव अध्यायां में विभक्क प्रकाशित हैं, उन का हिन्दी अनुवाद छुपना बाकी रद्दा है इस के छपने के * बाद फोई स्वामी जी क्वला ऐसा लेख वा व्याख्यान अब हमारे पास नहीं है कि जो ग्रन्थावली में नहीं छुकका। यदि किसी रामप्यारे के पास कोई ऐसा खेख या व्याण्यान हो कि जो अन्धापली में आया हो तो डसके, भेजने की

विषय सूची

विषय पृष्ठ पाप की समस्या 4 भारतवर्ष के संबंध में तथ्य और आंकड़े १४ पत्र मंज्जूषा २० कविता ध्छ

था प्पाड0 8 7, 6, 85773 &फए पफ्ताड 4अद्ा.0-0ापपप का: एफछ58, 7,ए00एफ्0० एफ:

मय < 5 हु)

4३% 300

स्‍्वासी राखतीय ।॥

0/च्ड० ९०

पाप की समस्या

4 मु हर २८ दिसन्वर १९०२ को दिया हुआ व्याख्यान )

वेदान्त की शिक्षाओं पर कुछ आपत्तिरां राम की -हृष्टि में ,लाई गई हैं। उस दिन क्रिसी मनुष्य ने कहा कि यदि .दिन्दुओं का तत्वज्ञान यही हो तो भारत के राजनीतिक एतन ६.) कारण समभना सहज है दूसरे मनुष्य ने राम रे पूछा,यदि्‌ िन्दुओ की शिक्षाये,चेदान्त, अथोत्‌ यह तत्वश्ञान, यद्द घमे दुनिया का सर्वोत्कष्ट धम और तत्वशान होते, तो भारतवदर्ण इतना श्रन्धकार भ्रस्त और ईसाई देश इतने समृद्ध क्यों होते ! राम इस समय इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देगा, क्‍योंकि यदि ये प्रश्न उठा लिये जांयंग ते निश्चित विषय को त्याग

पाप की समसयों-

अजन्लुसन्धान होना चाहिये, अन्यथा कंठिनता हल हें: होसकती यही खुख मलुष्यों को गुलाम बनाता है। दोमँंगे रण (770[9870 ए़&7 ) इसका दछान्त है। यह हे जो एक लड़की को वीर बना देता है और दूसरी को नहीं। यह कद्दना गलत है कि यह सुख स्वयं नारी से आता है। हमे इंसमे की भूल की समक लेना चादिये। उस में या उसके शेंरीर में कोई सुख नहीं है

यदि सर्च खुख प्रियचस्तु (वा प्रेम पात्न ) में केन्द्रित दी, तो क्या स्त्री ओर पुरुष सदा एक दूसरे के लिये सुख का स्त्रोत बने रहते ? हम जानते है. कि यह खत्य नहीं है | अब आप- अपना सुख भोग छुकते हो, तो डसके घाद आप किस दशा में होते हो? और छुख की चतना फिर नहीं रहती जब तुम नपुंसक होते हो, तब क्‍या वह (नारी सुख का,स्त्रोत होती है ? जब तुम्हारी अद्धांगी रोगीहोती है,जब वह व्यभिचारिणी होती है, जब तुम बीमार होते हो, तब उसमे कोई सुख नद्दी रहता। यहां तुम दो पृथक सत्ताएँ पाते हो--छेत जब ये अनुपस्थिति होती हैँ तो केवल शरीर ही की पूरे एकता नहीं होती किन्तु मन और आत्मा की भी होती है फिर एक देसी अचस्था आती हे जिसका वर्णन नहीं हो सकता तब देह देह नहीं है, संसार संसार नहीं है, पकता, स्वगे, स्वाधीनता, असयता-- क्योंकि देत नहीं हे--अभिन्‍नता, अद्धेतता विराज्ञती दे। दुनिया और देह के विनाश का बिलकुल नाश हो गया ! द्वेत-भ्रम का अब अस्तित्व नहीं रहा। में देह है और बह (नारी) देह हे; हम दोनों शरीर,मन, दुनियां से ऊपर हैं ' बेकुंगठ फिर प्राप्त होगया, लद्य पर पहुँच होगई, अब केई

( + ) शीघ्र कृपा करें जिस से रोम के समग्र अ्न्‍्था में बह भी शामिल॑'हो-सख़के

अन्त मे इश्वरः .का' धन्यवाद हे कि लीग अपनी धीमी वा अविश्वान्त गति से इस असिविशाल कार्य को करने में सफल हुई है, झोर जिन महानुभावाों ने अपनी उदारता और राम भेम से भेरित होकर इस मद्दान काये में तन, मन या-पछछ घन से सद्दायता दी है उन के लिये तो मेरा रोम घन्य- * श्‌ बाद दे रहा दहे। आशा हे वे प्यारे इसी प्रकार अपनी सद्दायता का लाभ लीग को पईुँचाते रदेगे जिस सर लीग (.५ झपने उद्देश्यों में भली भान्ति सफल होती सटे ४» |

, मंत्री

&४

पाप की समस्या. शक

चारिक क्लेश होते हैं। तभी स्वार्थों की मुट्मेड़ होती है, और विवाह चाली रुकावर्ट तंव उत्पन्न होती हैं। वेदान्त को समझो ओर सुक्क हो और नाम मात्र भ्न्थिश्रों के अतिरिक्त

ओर कोई गअन्थि नहीं हे हरेक स्वाधीन होने के लिये हे। अपने बच्चों को पूर्शतया स्वाधीन होने दो | उस से मनुष्य: कभी नहीं बिगड़ता संपूर्ण संसार एक स्वगे है, ओर परमेश्वर को कभी धोखा नहीं दिया जा सकेगा

छ5 | छ5 है! ! [|

००4 दर भारतवर्ष के सम्बन्ध में तथ्य ओर आकड़े.. २६

पाऊंड दो गया हे | भारत में यूरोपीय क्षफसरो को तनखाह, जिनका यथार्थ में सब ऊंची नोकऋरियों पर पूर्णाधिकार है, उक करोड़ पाउड पड़ती हैं

भारत की निहलोह ( खजे बाद देकर नकद्‌-76: 780076 ) की आधी रकम, जो अब करोड़ ४० लाख याउड है, हर साल भारत के बाहर बह ज्ातो हे

[ ऊपर के तथ्य, ईग्लड में प्रकाशित एक पुस्तक, सर रोमेश दत्त सी. आई. ६० कृत 'चुटिश भारत का आथक - इतिहास (7४8 +#;0070770 प्राह्0ए फिल्रपशा ]४0/9) के आधार पर दिये गये है। ]

१६०१ में भारत में विधवाओं की संख्या ४४३६३६० थी ।* बंगाला प्रान्त में २६४५६२२ बालिका विधवाएं हैं

| ७४ !! ४४ !!!

किक न-र था

ढ़ ५० + थक बडे जो

& वाशा

छह २४

0). #.

8. पहला 8 9 7 एश्फाण्धशा१-

5

]902,

॥५क्‍ हि

- पत्न मज्जूपा, २६

व्यवद्दारतः आसन्तरिक साम्यता पर, जो हरेक वस्तु पर शासन करती हे,विश्वास करना |

लोगों के शब्दों, या बाह्य आचरण से नतीजों पर फुदक जाना और रुद्दानी कानून में विश्वास पूर्वक पूणतया संतुष्ट रहना ह॒ ८. लोगों से चार्तालाप में (निज्ञ स्वरूप से ) वहुत दूर भटक जाना | . यबाते हैं जो लोगों के मन में असंतोप डत्पन्च करती हैँ। इस लिये कलश के इन आठ स्लोतों ( कारणों ).ल आप दुर रहियेगा | ३४ !

तुम्हारा अपना प्रिय स्वरूप रामस्वासी के रूप में ॥श्रीडक॥. मुजफ्फर नगर, श्ण अक्टूबर १६०४५। प्रियतम, मदान्ुभावच, हि हाथों में मली हुई राख खाल को साफ (स्वच्छ) कर देती है इस प्रकार, शाशीरेक रोग तीन बार धन्य हैं, जब थे अपने साथ देहाध्यास रूपी मल्न को जड़ा देते हैं अरे, रोग ओर पीड़ा का स्वागत करो !

जब तक एक निर्जीय शव घर में पड़ा है, तब तक सब प्रकार की महामारियों का बड़ा खठका हैं। जब मुद्दा हट जाता है, तब्र स्वस्थता का परम राज्य विराजता दे ठीक : इसी तरह जब तक देद्ाध्यास का पोषण किया जाता है, तब

डा

र्‌ स्वामी रामतीर्थ-

देना पड़ेगा। किन्तु ये प्रश्न कुछ बाद के व्याख्यानों से ढठाये जांयंग और इन के उत्तर इस तरह पर दिये जांयसे कि सथघ लोग चकित हो जांयगे | किन खोगो को ( राम के ) कुछ उपदेश खुनने मिले है, राम केवल उनसे अधीर हे।ते री, तुरन्त नतीजों पर फुदकने की प्राथना करता है। राम चाहता है कि वे तनिक धीरज रफ्खे और चक्का को! आयद्रापान्त खुन |

मुसलमानों की इंजील, अलकोरान में एक वाक्य इस प्रकार छे, “असदाचार ओर दुगुण के हवाले (यांदे ) तुम अपने की कर दो, मद्यपान ओर विषयभोग भे ( यदि ) तुम अपने जीवनों को लगा दो, तो तुम अपनी सत्य/नाशी/ आप कर रहे हो, तब तुम अपना सत्यानाश आप भ्रतिपा करोगे ।” एक मुसलहूमाव सज्जन शगाव पीते ओर इन्द्रियो खुखों के पीछे दोड़ता हुआ ओर काम-वासनाओं भागता देखा गया था। एक मुसलमाव धरम्मोचाय उस पास पहुंचा ओर उसे फटकारते हुण कहा कि "ऐेला रे कर क्योकि तू अपने ( मुसलमान के ) पेगस्वर के नियत किये हुए नियमों को मंग कर रहा है।” तव इस शराबी ने अलकोरान के बचन का पहला भाग तुरन्त पढ़ा ऑर कहा “यह देखों। अत्तकोरान कहता हं, तुम शराब पियो ओर आनन्द करों ओर अपने आप कामाचार के गह कर दो। अलकारान का, हमारे धर्मेग्रथों का, हमारी ईजी का, यह यथाथ चचन है। अलकोरान, धंमैश्नेंथ मद्रिपान ओर कामयरायणुता की आज्ञा देते हैं। कक्‍्योंचि दे?”

तब तो धर्माचाये ने कहा, “भाई !रे भाई. तुम क्‍या करने जा रहे हो ? बाद के भाग को भी तो पढ़ो, ' तुम आप

पाप को समसस्‍्य:[. दर

अपना सत्यानाश कगोगे (यह है बचन का दूसरा साग ) | दूसरा भाग भी तो पढ़ा शराबी जवाब दिया, “पृथ्वी- तल पर एक भी महुप्य ऐसा नहीं है ज्ञो सारे अलकोरान पर अमल कर सके | छुझ इस हिस्सल पर अमल करने दो। यह आशा या कल्पना नहीं की जा सऋती कि कोई मनुष्य इंजील की सब नलीदतों एर अमल कर सकता है। कुछ लोग “थोड़े अश पर झपल कर सकते हैं ओर झुछ बड़े अंश पर; ओरबस। उस समग्र अलकुरान पर कोई नहीं ऋमल करता। फिर आप सुक से समग्र पर असल करने की आशा क्यों रखते हैं ? मुझे वचन के प्रथम भाग का उपयोग करने दो” अतः राम की केवल यही प्रार्थना है कि उस मुसलमान शरादी की तऊ-शेल्ली वा तत््यज्ञान का उपयोग नहां किया ज्ञाना चाहिये पूप वचन पढ़ना उचित है, तब परिणाम मनिकाला जाय, उससे पहले नहीं।

एक समय रास के पास एक सेन की घड़ी थी। चेर में लगे हुए छोटे अलकारो भें एक खिलोना-घड़ी थी, जोः चास्तव में कुतुबछुमा या परकार था| बह ( खिलोना-घड़ी ) चलती नहीं थी, किन्तु खुश्यों को एक विशेष पघरकार से ठीक करने पर वह एक बज्ञा सकती थी। सदा एक वज्ा रहता था, द्वेत के लिये काई स्थान नहीं था चद्दी एक तुम हो। समय, स्थान ओर कारणत्व अर्थात्‌ दर्श, काल, वस्तु से ऊपर खड़े हो ये सब ठुम से शाखित द्वोते हैं, तुम उनसे नहीं दे तुम्हारी कल्पना शक्ति के चाकर हे--दो ओर तीन मिथ्या ं--चह एक तो काल के वंधन से सु दे

प्रण-- क्या विवादित मनुष्य आत्माज्ञभव की प्राव्दि

६3

श्र स्वामी रामतीर्थ-

का होसला कर सकता है?

प्रक खूचना के उत्तर में कि “इस भश्न रा विचार किया जाय ओर इसके बदले में राम के यांघे हुए विषय का अनुसरण किया जाय राम कहता हे कि दरेक विषय राम का हे इसका यदि पूर्ण विवेचन किया जायगा तो आपका बड़ा कल्याण दोगा--किन्तु यद विस्मयज्ञनक है, तुम्दें यद्_ पूरा सुनना दोगा। इस देश के विचारों के शायद यद्द विश्वित्र जान यड़े राम इसकी परवाह नहीं करता, वह केवल तुम्दारा आदर करता है।

हस द्वश्न के उत्तर मे वेदान्त कहता हें, “अचश्य ही, झोपधि बीमार को दी जाती . है, ओर उसको नहीं कि जो ऋच्छा भला हे?

जो दुनिया ओर उसके खतरों में सब से- अधिक फंसे है, उन्हीं को रसकी सब से अधिक ज़रुरत है। एक अविवा-

'द्वित महुष्य के लिये आत्मानुमव उतना सहज नहीं दें

जितना कि विवाहित ओर पारिवारिक जीवन को यथाथे रीति पर निवोहकारी मनुष्य के लिये किन्तु असावधान ढेग से वह अनुभव नहीं कर सकता ओर उल्टा नीचे घसीटा जाता दे। पुरुष ओर स्त्री के सच्चे संबध के ज्ञान की बैखबरी बड़ी मुसीबत का कारण होती है। इतने मदत्वपूर्र ओर हदय के नगीची विषय का निवारण क्‍यों फिया जाय हस प्रश्न का एक पहलू ( विवाह की तेयारों ) इस समय नहीं उठाया ज्ञायगा ? यह एक बड़ा विषय है ओर बाद के किसी व्याख्यान से इस पर विचार किया जायगा।

शम के विषाद के बाद उसने ओर उसकी ख्री ने दे! साल सक बह्मचर्य पालन किया ।यह तथ्य है, केवल ज़बानी

पाप की समसस्‍्या- प्झ खलमाखनये नहीं।

विवाह हानिकारक नहीं है, केवल वह कमज़ोरी ( हानिकर ) है जो उसमे क़ाबू जमा लेने पाती हे; चह घस्तुतः हानिकर है; भय, पदार्थों ओर रूप में लगन, “में देह हूं, मेरा साथी देह हे, इस कल्पना की पुष्टि करना, अधि कार जमाने की लालसा ओर उस का भाव ग्रहण करना पतनकारा तत्व हैं यदि वेचाहिक संबंधों के पालन का यही ढेग हो, तो मनुष्य कभी आत्मातुभव नहीं कर सकता।

5 कक

. पिनेलोपी (?शा० ००७) जब बीनती और उचेड़ डालती ' है, तो उसका काम कभी केस समाप्त' हो सकता है? घट मलुष्य भला कैसे उन्‍्नीत कर सकता है जो सदा उस सद का निराकरण कर देता है कि जो उसने प्राप्त किया था! ' बैदान्त निभयता से कहता है कि तुमर्म शक्ति का संचार होना चाहिये, तुम्हें डड्चतर प्रेम से परिपूर्ण हेाना चाहिये, जिसे भूठ ही में प्रेम कहा जाता है, उसकी तुच्छता और नीचता से ऊपर उठना चाहिये--देद्दाध्याल से ऊपर उठो। यह है बीनने की क्रिया। ज़ब तुम पति या पत्मी में केवल देह देखते हो, तब सब किया धरा चोपद होजाता है। केस तुम उन्‍नति कर सकते हो? क्या इससे यह _ निकलता है कि लोगों को विवाह नहीं करना चाहिये! नहीं, किन्तु विवाह का उपयोग मिन्‍न होना चाहिये | वेदास्द के उपदेश को समझो विवाह को अपने उक्तष का एक साधन बनाओ, तब वह वड़ा सहायक होजाता है। ठोकर लगाने वाला ढेला ज़ीने का वा पार टपने का पत्थर बन खाता है। जब विवाद काम-विकार की शुल्ामी बनजाता है, तंज मुम्दारी दर बार की तुष्टि में गुलामी बढ़ती है, और तुम

कं स्वामी रामतीथे. अधिकाधिक नीचे ही ड्बते जाते हो अमे-प्रवतिकोी (70.॥०१४) के वचन नारी के विरुद्ध है। वें कहते हैं कि नारी “नरक का द्वार है। राम सहमत नहीं कै।सड़क पर चलता हुआ एक मनुष्य (शराव की एक बोतरू उसकी जेब से दाहर निकली हुई है ) एक पुजारी से मिलता है. जल की राह पूछता है, उसका परिद्शन करना चाहता है, जैसा कि राम ने पिछले सप्ताह किया था। पुजारी के हाथ में एक छड़ी हे और उससे उसने बोतल छुई | कंदा कि “८ भाई, यह सबसे नज़दीक' का रास्ता हैं, यह तुम्द अवश्य वहां पहुँचा देगा इस प्रकार नारी के सम्बन्ध में कहा जाता है। डुनिया एक जेल है--आधुनिक विचाह अचश्य तुम्हे वहां पहुंचाता है यदि नर ओर नारे एक दुसरे के पतल का कारण हैं, तो उसी परमेश्वर ने जिसने' इंसलि लिखी हे मनुष्यों के हृदय में नारी को ढूँढ़ने की फेरसी इंज़ील क्यों लिखी ? यह ते वचर्नाचिरोध है इस भ्रन्थि भे पुक गृढ़ अर्थ हैं। वह अज्ञान हे जो इसे नरक का उपाय बनाता है केचल उसी को दोप देता चाहिये, कि विवाह के सम्बन्ध की | मश्न यह है कि उसे ( अज्षान को ) दूर . केस कया जाय | यह एक शत्व वदंन्दुह यादे शनन्‍्य दशम- लच विन्दु (९९४३०) 00४) की दाहियी ओर शरक्खा जाता है, तो उसका मूल्य घट जाता हैं| शल्य खद कोई मूल्य नहीं रखता, अपने सम्बन्ध ओर स्थिति से ही वह सूदयवान बनता है इसी तरह इस मामले मे आप की स्थिति सम्बन्ध का मूल्य स्थिर करती है, अपने आप खे नहीं, सिर्फ आप के अपने ढेग से | मजुष्यको अपनी स्त्री में खुख क्‍यों मिलता हैं ? इसका

ट्् स्वामी रामतीथे-

इशा या अवस्था नहीं ! वेदान्त कहता दे के तुम- तब अपनी सच्ची झात्मा के लिये शक्ति आर परमानन्द होते डो,

छो तुम सचमुच दो उसने पूरा मंडल ( चक्र ) बना लिया

ह--धन और ऋण की एकता दोगई दे, पूरी घूमी हुई

घिजली-बत्ती की सी रोशनी हो रही है बिजली का घेरा 'बूरा हो गया है, धुंबे एकत्र होगये ढें--और मामूली या

असली हालत फिर होगई है ! आनन्द, निर्माकता, उत्पादक शक्ति, साक्षाव ईश्वर-अर्थात्‌ असली यथार्थ आत्मा,

झौर तय हम कद सकते हैं, “यद महलष्य ईश्वर का पुत्र

है। जब पति और पत्नी मूलतत्व में लीन द्वोगये हैं, , सच उसमें गल जाते हैं, तब सारी दुनिया विलीन हो जाती

है, मानो श्रात्मा खा ली जाती है; सब जातियां, वर्ण,

ओर सम्प्रदाय चावल के तुल्य होते हैं, जिसमे सत्यु मसाला

डालने के समान ( चटनी) होती है, आत्मा उसे खा खेता

है, क्योंकि आत्मा उत्पादक शक्ति है।

दुसरी ओर हम देखते है कि, वेदान्त के अनुसार अज्ञानो चुरुष, जानता हुआ, बाहरी रूप, मिथ्या पदार्थों के प्रेम में कस जाता है, आत्मा का अनादर करवाता है ओर केवल बाहरी चिन्हों का विचार किया ज्ञाता है

५. पक मलुष्य जेगल मं पक किताब ज़मीन पर पड़ी देखता है बिजली चमकती है। चह मूर्खता से समभता हे कि बिजली का कारण पुस्तक हुई है, अन्यथा किसी तरद्द नहीं भानता, ये दानो चीज़ें उसने एक साथ देखीं और समभता है कि एक दूसरी की कारण है सो मनुष्य को एकता में झानन्द की प्राष्ति होती है, जिसका कारण वयास्तव में-नर था नारे नहीं हे, किन्तु परमेश्वर की वास्तविकता है, पर

पाए की समस्या. ६.

अपन भय मे घह डस आनन्द को एक मानवीय पदाथे का संसर्गी मादता हैे।

आप इस तथ्य का क्या उपयोग कर सकते हैं? आप को उसी कण अनुभव करना चाहिये कि जब मन पदाये और विषयभोग से हटा लिया जाता है और केवल आनन्द का विचार करता है जो एक शक्तिरूुप, तेज स्वरूप, सच्चा आत्मा है, तब अधम मन में उतरने की कोई ज़रूरत नहीं है, जा सायब हो जाता है,--यह देवी तत्व वही है जो सूर्य, चन्द्रमा, शाक्क, अनन्त, देश काल चस्तु से परे, एक सागर है, जिसमें सब पदार्थ लहरों, तरंगों, झूवरों के तुल्य हैं, असली, आधारभूत, मूल तत्व के रूप ह। तुम्हारे शरीर इन तरंगों ओर लहरों के समांत हे, भेदभाव का एक मा कारण जल है। एक वच्चा नदी की ओर देखता हुआ कदता है, “भाई ! देखो, यह पक लहर रही है? यहां जल पहले ही से है, किन्तु प्रधानता व्यापार को दी गई हे। “में तुम्हें धुक लहर दिख।ऊँगा, कि एक नदी ठीक बही बात यहां भी है, एक निवेयव पस्मेश्चर है ! सूर्य, चन्द्र, शरीर, ओर तरंग “मे तू” रूपी मानस सागर भे उमड़ती हे इस त्तरदह मनुष्य अनेकता लाता है, नाम रूपी दृश्य में पधारता है, शरीर का संघप होता है, तरंग एक दूसरे से टऋरती हेँ। सुख केवल पदाथे के संघर्ष के द्वारा नहीं होता, वह तो आत्मा की उपस्थिति है, जो लहरों के टूटने पर स्पष्ट होती है | चेदान्ती बच्चे की सिखाना चाहता हे कि सोना कया है, उस पक झओगूठी दिखा कर कहता है, “यह खुबरे है।” बच्चा कद्दता हे, “कया गोलाई सोना है?” नहीं। /क्ष्या रंग सोना हे?” नहीं। “चिकनाई !” नहीं, नहीं!

9७ स्वामी रामतीर्थ-

६]

पक भावना दी कैसे जा सकती हे ? सेलने की दूसरी बस्तु भी दिखाई जाती है अन्ततः वह भावना वा. कल्पना निकाल ली गई वह इसका अनुभव करता है। उनके गुणों को यथाथे रूप से पहचानो ओर उन्हे जीवन में चता बीरबल ते बादशाह से पूछा (के अन्धो की संख्या अधिक है या दष्ठि वालों की बहस हुईं और निश्चय हुआ कि इसे साबित किया जाय | वादशाह समभझता था कि अंधे कम हैं। इस लिये प्रमाण के लिये वह एक डुकड़ा कपड़ का खाया, ओर झपने सिर में लपेट कर उसने पूछा “” यह क्या हें?” उत्तर मिला, पणड़ी | तब उसने कपड़े को अपन कनन्‍्धां पर रखा ओर लोगों से पूछा, “यद्द क्‍या है ?” उत्तर मिला ' शाल ?, तीसरी बार उसने कपड़े को घोती की तरह पहरा, ओर उन्हीं ने इसे उसी नाम पुकारा। सब अंधे, अथे ! इन ( उक्त नामों ) में से यह कुछ भी नहीं है, केचल कपड़ा है, नामी ओर रूपों से कपड़ा छिपा दिया गया हे ।'' अजन्ुभव करो कि शआात्मा क्‍या है, सोने को देखने के लिये यह ज़रूरत नहीं हैं कि आप डसे तोड़े जब आप नर, नारी, सवरों, खबरों कपड़े आझोर सेन का विचार करत है, तब आप पीछे को (आधारभूत) वास्तविकता का नहों विचार करते

मत कहो कि विवाह धरम के विझुझ है। देखो कि सुखकी चास्तादेक दशा क्या है, वास्तविक स्वरूप क्या है। आत्मा- जुभव के आंभल्ापी मनुष्य की हेखियत से, सच्चे आतन्न वास्तविकता, मल तत्व! पर विचार करे जब मलुष्य, पगड़ी, शाल रूपी पहचान की चेतना तुममें रद जाय, तब

भ्यान परायण हो कर बन्धन के कारण को निम्मेल कर दो,

पाप की समस्या. श््ः

धास्तदिफता में डूब आओ ई३०--वह में हँ-इसे सिद्ध करा, क्या वह मेरी असली ' प्रकृत्ति हे ! क्‍या में वह हूँ ! यदि में हूँ, तो दुनिया केवल एक तरंग दे, में क्‍यों उसके पीछे लल्नचाऊं ? क्यो ? क्योंकि देदीप्यमान ख्य में कोई विजली की रोशनी चमकती नहीं है। चह केवल अधरे ही में चमकती ओर प्रकाश देनी है | घीरे धीरे उज्ज्वल सूर्य-प्रकाश में आओ, इन्द्रियों का खुल दीपक की तरह कोई प्रभा नहीं फलाता गाली देना और निन्‍्दा करना ' अस्वाज्षाधिक दे | तुम इसे तभी कुचल सकते हो जब इस से ऊपर उठो | भाई ! उपाय का उपयोग करो और डठो | दुनिया खुद एक अजमभा है दसरे अचस्मों की कोई ज़रूरत नहीं है सब पापा के कारण से डसे जो कचल आत्मा को जानने से दूर होता है | विशुद्धता का अदुसव करो और घिशुद्ध हो जाओ दूसरे किसी थम की शिक्षा. देना अस्वाभाविक है! +[)0 6006 07" 00 ग्र्ा 60776, एज 78 स॥ 776- लए आधा", 07 हॉँवए #80, 87606 ए0प #8; 778 ए०ए 6, ॥6 ए00ए 7079€. ७० 706 78 486€, 4)7580/78 39 77९, 89 8 86 )887/70) 889. (ैंए87 800 70 856807677--- 8-78 ता कराए गहाए8 बावे 74 कफ. # आओ वा आओ, 'तुम मुझ में हो दुर रहो, था, सिकट रहो, जहां क््दी तुम हो,

डर स्वामी रामती्थ,

मुझ में तुम हो, मुझ में तुम्हारी गति. नहीं, में तू हूं, मुझ में घुल जाओ, और आनन्दमय सागर, हो जाझे/ दाता हूँ और मांगने चाला नहों हें . भरी प्रकृति को भोगो और खुखी हो |

भारत में तर्क संगत, पैज्ञानिक, और स्वाभाविक विधि यह प्रचलित है कि सती सहायता ऋरती हे, पति की बाधक नहीं होती

आत्मानुभव कर चुकने के बाद दो साख ओर राम शहस्थ रहा | अपनी रसत्रीस उसने चेदान्त की चचो- की, ओर धह फूल, बतियां लाती, और निञ्ञ-आत्मा में क्लीन हो जाती थी। वह अब दंडवत प्रणाम करके उपासना-करती हैं, बकिर राम की ओर तब तक देखती है ज़ब तक उस ( शम ) की देह उसके लिये एक ( परमात्मा का ) चिन्द्र नहीं है। ज्ञाती, » डच्चारती है, राम में आत्मा के दशन करती है और अपने आप में पस्मेश्वर को देखती है, इन विचारों को याहिर भेजती है, प्रत्येक आपस में परमेश्वर को देखता है, परस्पर एक दूसरे की सहायता करते है, ओर आत्मा- जुभव प्राप्त करते है। राम ने उस उठाने में सहायता दी। यह कुछ समय तक होता रहा, फिर उन्हेंने महीनों साथ बिताये, अधम बिचारों का कोई] खयाल उन्‍हें नहों आया: कास-पिकार जीत लिया गया था परस्पर एक दुसरे को यथार्थ समझते थे, दोनो मुक्त थे पति और पत्नी का विचार जाता रहा था, कार बधन नहीं था ( वचद्द उस अपना. पति नहीं समझती है और चह उसे अपनी ख्री समझता दे

खिचारों की संकरीणेता, और अधिकारों के कारण पारि-

भारतवर्ष के सम्बन्ध में तथ्य ओर आंकड़े !

भारतवर्ष का बाह्य रक़्त्ा लगभग वीस लाख चर्म मील है, अथवा अलास्का, ओरीगन और केलीफोर्निया छोड़ कर सारे अमरिका के यरावर हैं।

आदादी लगभग ३० करोड़ हैं, अथवा मानव जाति के पञ्चमांश के लगभग। रूस्पूर्ण साथाज्य में, पहाड़, ऊसर और जंगल के सहित प्रात वरग मील १६७ की आपांदी है, इसके सिपरीत अमेरिक्रा मे २१-४ है। बंगाल प्रान्त में प्रति वर्ग मील में श्य्ण की आबादी है। भारत के कुछ सागों में इतनी वड़ी आवबादो है कि दुनिया का कोई भी साग उतनी | आाचादी » उछह. रखता )

भारतवप से हर प्रकार की जलवायु है डसकी भूमि के एक भाग में दुनिया भर से अधिक्रतम जलेतुष्ठि होती है। दूसर दविसस्‍ल में, जो कइ लाख वर्षमील का है, एक वूँद भी पानी शायद्‌ ही कभी बदरलता है।

भारत मे ११८ विभिन्‍न भाषाएँ बोली जाती हैं, और इन में से ४६ सापाओं के बोलन वालों की संख्या एक लाख से अधिक हरे

चहां चीस साख से अधिक ईसाई हैँ, जिस में से १० लाख से अधिक रोमन केथोलिक हैँ, ४५३६१२ चचे आफ इ्लेड सम्प्रराय के हैं, रेश्शश्८६ कट्र ओआक चर्च हैं, २२०-६३ बंपटिस्ट हे, १४५४४५४ लुथर-अनुयायी हैं, ३८२६ प्रेलवाइ टीरियन हैं, ओर १५७८४७ फुटकर ईसाई हैं ।इन

प्र

इसाइयाों (२० लाख से कुछ ऊपर ) में विदेशियाँ, वृटिश

भारतवर्ष के सम्बन्ध में तथ्य और आंकड़े... १४

सेना, विदेशी धर्म प्रचारक ( 7ग580707५6४ ) इत्यादि, को आवादी शामिल है। इस तरह देशी ईसाइयों की संख्या अधिक नहीं हैं, ओर जो भारतवाली ईस'ई बनाये गये हैं, थे अत्यन्त नीच जातियों के हैं। उच्च जातियों का बिलकुल सपश नहीं हुआ है| अंग्रेज सरकार भारतीय खज़ान से हर साल पेंतालीस लाख रुपये इंसाई घर पर खच करती है

पिछली मर्दुमश॒मारी के अचु सार ४४७६२५४६६४ एकड़ भूमि पर खेती होती है, जो ओलत में आबादी के प्रति मनुष्य के हिस्सेम लगभग एकड़ है | दो करोड़ बीस लाख से अधिक पकड़ भूमि साल से दो फसलें पेदा करती है १७ कड़ोर ४७ लाख ३५ हज़ार मनुष्य निरानिर खेती करते हैँ ३५४६८००० महुष्य न्‍्यूनाधिक खेती के काम में नोकर हैं। २६ लाख ४६ हज़ार मन्ुप्य मवेशी पशु ) पालने भें ओर करोड़ ४५ लाख ७६ हज़ार खाद्य और पेय के उत्पादव में लगे हे। करोड़ १२ लाख २० हज़ार मनुष्य घरेलू चाक्करी करते हैं।१ कड़ार २६ लाख ११ हज़ार कपड़ा बनाने, रे३रे६१००० शौशा, बर्तन, ओर पत्थर की चीज़ बनाने में लगे है, ३२ लाख ८५ हज़ार चमड़े का कारवार करते हैं (ये सब मुसल्लमान है, ४२ लाख ६३ हज़ार, सब मुसलमान, लकड़ी, बेत और थटाई बनाने का काम करते हैं ।) लाखों हिन्दू मर्ड्मशुम'री की शब्दावली में “निन्ध पेशों” मे हैं--बिलकुल , छुछ क'ते ही नहीं उनस पहले उनके पूर्वजों, ने जो कुछ - किया, वही यदि वे करने में अलमथे हैँ, तो वे कुछ करेंगे ही नहीं

भारतमे कुल १४०४६६१३४ नारियोम से केचल ४४४४६४

हक

लिख पढ़ सकती हँ--हज़ार में एक से भी कम ३०

श्द स्वामी रामतीथ-

करोड़ की कुछ आवादी में से अपढ़ी की सारी संख्या २७ करोड़ ६५ लाख ४६८ दज़ार सो पछत्तर दे इदे है।... इं० १६०० में करोड़ ४० लाख मलुष्यों पर दुर्भिक्ष का प्रभाव पड़ा था द्रवार के साल में ५० लाख भु्खों मर गये ।' जीवन के लिये संग्राम प्रति वर्ष भयंकर होता जाता है।. शीघ्रता से उन्नति करते हुए उद्योग-घंधों, रेलो का ब्यूह,: तथा दौलत और काम काज के अन्य साधनों के बढ़ने पर भी मजूरी का निर्ख बढ़ने के बदले घटता जाता है।

,.. भारत में २० करोड़ से अधिक आदमी पांच, पेसे रोज़ से भी कम पर निर्वाह कर रहे हैं।१० करोड़ से अधिक तीन पैसे रोज़ से कम पर जी रहे हैं, और ४५ करोड़ से अधिक एक पैसे रोज से भी कम पर बसर कर रहे है।, पूरी आबादी के कम खे कंम दोतिहाई भाग को अपने जीवन , के किली भी साल में उतना काफी सोजन नहीं मिलता. जितना कि मानवशारीर को पोषण के लिये आवश्यक हे। देश के अतेक भागों में कुदुम्ब औसत में एक्र चोथियाई एकड़ भूमि पर बसर करने को लाचार हैं, तथा और लाखों आये एकड़ भूमि पर। स् ] ... भारत के रुई के खेतों में जो नारी और नर काम करते उन्हें ५] रुपया महीने से अधिक नहीं मित्रता एक पेसा इजामत बनवाई दिया जाता है। सरकार के नोकर डाकिये, सिटी ले जोनवाले,अधिकल अधिक केवल १२|८* मासिक पाते हैं, जो लगभग डोलर के वरावर है। हृद्टे कट्टे भौर इोशियार कारीगर, मेमार, यढ़ई, और लोहार ८) या १२) रु० महीने से अधिक नहीं पाते, ओर सुनौम, शुमाश्ते तथा अन्य लोग, मकान के भीतर के पेशे चाल १६] से '

भारतवर्ष के सम्बन्ध में तथ्य ओर आंकड़े. १७

२४) रु० महीने तक पाते हैं। भारत के सब मजूरी कमाने वालों की एक साथ कर लिया जाय ते| डनकी माहवारी आमदनी लगभग ठीक उतनी ही है ज्ञितनी अमारेका के उसी दर्ज के लोग एक दिन भे पाते हैं

सारी आवादी का द्येतिहाई भाग अपनी सम्द्धि के लिये जलबृष्टि के सदारे है, और यह भी कहा ज्ञा सकता है कि, अपनी ज़िन्दगी ही के लिये वह जलबृष्ठि के सद्दारे हैं| यदि पानी वहां बरस, ते दुर्मिक्ष पड़ज़ाता है।चे काफी नहीं कमा सकते कि दुर्भिक्ष के लिये अन्न जमा कर सके | अन्न का अमाव नहीं, बहिक धन का अभाष दुभिक्ञजन्य व्यथा का कारण है, क्योंकि साम्रान्यतः जब भारत के एक भाग मे दुर्निक्ष होता दे तब भारत के अन्य भागों मे यथेए्ठ, आर कसी कर्भ, यथेष्ट से अधिक, अन्न पेदा होता हें।

अग्रेज़ी सरकार की जो नक़द ( पक्की ) आमदनी रेल विभाग के एक सप्ताह (२४ मार्च १६०४ सप्ताह ) में हुई, चह ७६ लांख अमेरिकन डालर ( लगभग करोड़ ४० लाख रुपये ) थी। यह निरन्तर बढ़ रही है

रॉक /

भारत में ६५ सेकड़ा सरकारी नोकर भारतवासी हैं, ओर सरकारी नोकरों को जो कुल रक्तम तनखाह में मिल्तती है उसका केवल ३४५ सेकड़ा उन्हे (६५ सेकड़ा भारतवासी सरकारी नौकरों का ) मिलता है, ६५ सेकड़ा रकम खेकढ़ा अश्रेज़ सरकारी अफसरों की जेब में जाती है।

समस्त विदेशी धर्म अचारक समाज ( ई07शंहए ग्रांहशंणाक्षा'ए 8026068 ) की आमदनी सन्‌ १६०३ ६० में

श्द्ध स्वामी रामती्थ.

२०२५६८०४५७ डालर थी यह प्रायः भारतवर्ष में ख्ची जाती है।

भारत में वृट्टिश पूंजीवाद का प्रारस्म ई० रद००म भारतवर्ष में ७० हज़ार पॉड की पूंजी से इस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना से हुआ हैं | इ० श्प्श्३े म॑ इस्ट इाडया कंपनी का व्यापार वनन्‍्द्‌ हो गाया। उस तारीख से शै८४८ तक कस्पनी केवल सोरत का शासन करती रहदही। शप्शफ में, भारतीय गदर के बाद, खुद कम्पनी की ही -समाएण्ति

होगई किन्तु उसकी नीति जीवित है। कंपनी का. सूलघन

ऋण! से चुकाथा गया, जो भारतीय ऋण चनाये गये, जिसका व्याज़् भारतीय टेकसों वा करों से चुकाया जाता है। सप्नाट ने ईस्ट इंडियां कपनी सर साम्राज्य खरीदा था, किन्तु भारतवासियों ने खरीद का रुपया दिंया। भारतीय ऋण, जो १८४७ में £ करोड़ १० लाख पाउंड था, १८६२ में बढ कर करोड़ ७० लाख पाउंड हो गया। तहुपरान्त शान्ति के जो ४० साल वबाँते है, उनमे भारतीय ऋण चरावर बढ़ता ही गया हे। १६०२ में चह २० कड़ोर पाइंड था, जिस पर भारत के लोगो को हर साल ३० रद ४० लाख पाउंड, या डेढ़ करोड़ से करोड़ डालर तक, ' ब्याज का देना पड़ता है।यह एक अरब डालर के ऋण के वरावर की रकम दे जिस पर उन्हें (भारतवासियाँ को ) व्याज देना पड़ता है। दुनिया का कोन देश इस तरद्द के से भार को सद्द सकता है? भारतीय राजस्थ (माल- गुजारी, 7६ए०प९) से जो घर खर्च ( स्0ता९ 0मप-2०8५ सरकार द्वारा विज्ञायत भेजी जाने वाली रकम ) इंग्लैंड इर साल भेज्ञा जाता हे, वह बढ़कर करोड़ ६० लाख

क्

पत्र सजञ्जूबा पुष्कर, जिला आज्ञमेर | २२ फरचरी १६०४३) परम अन्य, प्रिय संगवन, ' जहां राम है वहां का जलवायु केला छुन्दर है। प्रत्येक, 3 ्ि कक के कि दिवस नववर्ष-द्विल हे, आर प्रत्येक रात्रि बड़े दिन * कप शो तप (00॥795798) की राज्ि है नोॉला आकाश मेरा प्यात्षा हे 4 4 जे शोर जगमगी रोशनी मरी मद्य हे पहाड़ों में में हलकी हवा हूँ, नीचे कुखबों ओर शहरों में रे रन कर भश आऔ॑आ 5१ हल में रंग ज्ञाता हँ--ताज़ा ओर सब खड़को से में पूणे रूप रे फैलता हुआ गशुज्ञरता हूँ

9689 जाप 76, ह0॥ | एप ;

क्‍90ए0॥ एग0 706 ॥70प९7 4॥6 (ं#॥ए |

0 700९ (06 भांशए 800 जछ्08 7 48 झ९ं07 7पष्टी 707' 08ए,

32989) धृरां80ए,.. 7888, ]0888 0६ ्षतए 7707.8,

परत00 एशग58$ 70 ]0988,

3 00 &॥। ४678 [70प0 एफ ;

| #णेपे ॥6 १6७६ ;

२06 ४ए (6 एशी0एछ हप्चा08 707 ६6 ॥|ए७ (७९७,

डिपो 79 99 6७76, हए रक्का। 00 प९हा8,

पत्र मेजूपा. श्र

मनुष्य को में छूता हूँ,ओर स्त्री को में छूव। हँ--ऐसा मेरा आझीलामय मनोरच्जन हे |

में प्रकाश हूँ, बड़े स्नेह से में अपने वछचो-फूलों ओर पौधा- को पोषता हूँ | खुन्दरों ओर बलवानों के नयनों ओर

हर

छुदयों में में रहता हूँ। मेरे खाथ ठहरो, तथ पाथना करूंगा, है| मेरे साथ दिन भर आर रात भर भी, ओर वहां भी जहां दिन हे और रात, घुपक्के चाप रहो | अब फिर परे जा, परे जा। लुम परे नहीं ज्ञा सकते है में भी वहां हूँ, जहां तू है; भें तुझे मज़बूत पकड़े हूँ, तो पीत बालू में ओर गंभीर नील में, केन्तु मेरे हृदय भें, तेरा हृदयों का हृदय है प्रकाशों के प्रकाश में रहने ले रास्ता आपदह्दी आप खुल जाता है। व्योरे का ठीक ठीक व्यापार अनायास द्वोता है ( गुलगव की कली की बन्द पंखुरियों की तरह ) जब कि भक्ति ओर दिव्य बुद्धि का खुखकर प्रकाश स्वतंचता से चमकता है आशा की जाती है कि “धडरिय डान” (एएघ्ावेश- ९8 407) का जनवरी का अंक आपने मिस्टर पूर्ण खूतरमंडी, ल्ाहोर से पाया होगा।

आपका अपना आप स्वामी राम तीथे।

श्र स्वामी स्वातीयथे,

जनवरी के अक में आपकी कविता कमलानन्द के नाम से भ्रकाशित की गई है, जो कि पूर्ण स्वामी (संन्यासी) सास है अब जब तुम और नये लेख से जोगी,तो वे '3० के नाम से छाप ज्ञायगे, यदि आप पसन्द कर

प्रिय महामाग गिरज्ञा तथा सब को प्यार, आशीर्वाद, आनन्द, शान्ति |

38४ | ७5 [| ७४ [!! 57558, मफण्त॥ 096 खंरालाइ8, 2687, $887-80एप एथऐड एग (2 2: (८4 हि 0ए९४७ 606 76 868 8 पादप ए७७, पच्च 06 #ा४ए४ पा शऑ>धा।! ७8708 (6 ४006, ८४ एए0०॥078 ६000 08 88 $6ए ७7४ 7/॥ए8 88 ह69, पआन्रीत20व 0ए 6 झं॥00068 70ए770 ४69, «४ प905807800९8 99 +6 2॥8 ह6ए 886, # [686 तेशाक्रादे ग्र0ा, 89 8 088 एांपर0प गाशा ि00 ६86७7 0ए8, का्प्रःश॥67, 8900/009, 890 जप [0५ 6 #बरएड ए9७ए00०7 विलंए छ्ंगह, * 870 ६8 869 73 ]009 7007-8ए878ऐ 70 ; छोतए 80-00 866 ६069 [ए68, 807 7708 छत आ०7॥8. £ 8] 406 76ए९7९ 07 8078 ती॥077४ 5०ए४. -* (0ए7त08त 0ए ह७05७ए6६४ छावे प88७7१+ पे # हक एा४ 8806 00878 069७ ए0"7 708ए 09७ # [छह धाशंए' 0७7 ईब878, थी! गाशं।' 90ए87/8 (0प्रापंगह, 0९४६ बिक 86 787 ॥6 एणए 88०.??

पत्र मञ्जूषा, श्३े

नक्षत्र

प्रचएड, निर्मेल, तारों से बोये हुए नस मंडल से प्रकाशित सागर के अशान्त मार्ग के ऊपर, रात्रि की भमरभराती हवा से आवाज़ आई,

“क्या तू होगा वेखा जेस वे है? क्‍या उनकी तरह तू रदेगा ?

24

“अपने इदेगिदे के मौन से वे निडर हैं,

“ज्ञो दृश्य वे देखते हैं, उनसे निराकुल हैं।

“से मांगते नहीं है, पर उनसे बाहर की बस्तुएँ,

“उनको प्रेम,मनोरंजन,ओर सहानुभूति अपण करती है “झोर आनन्द से तारे अपना चमकने का काम करते दूँ, . और सागर अपना दुर तक चन्द्र रुपहला लहराने

का काम करता है; “क्योंकि वे स्वयं समचित रहते है, “किसी मिननमत अच्तः/करण का सम्पूर्ण ताप देख कर

नम

छीजते नहीं हैं “अपने आप से परीमित और धपरमेश्वर के दूसरे काम की हालत से वे परवाह अपने ही निज्जी कामों में, अपनी संस्पूरो शक्ति ढालते हुए वे उस महान जीवन को जिसे तुम देखते हो पाते हैँ

घ्छ स्वामी रामतीथथे- 82 | लाहोर, ( भारत वर्ष ) २४ जुलाई, १६०४५. कल्याण स्वरूप !

/ रे हे िफर कह पु राप्त उत्तरी हिमालय के घन वनों में है ओर उस का अन्तिम पत्र निसत लिखित हे,जो संक्षेप में राम विषयक सब समाचार दे देगा-।

“दिन रात में समाप्त होता है, ओर रात फिर दिन में चदल जाती है, ओर यह आप का राम है; कि कुछ करने को जिसे समय नहीं। कार्य-व्यग्ने (0089 ), कुछ नहीं करने में व्यत्न आंसू बद्ा करते हैं, इस अत्यन्त वर्सोती ज़िल की निरन्तर बषो से अच्छा सुकावला कर रहे हैं। रोमांच होते हैं, आँख फटी अपने सामने की कोई चस्तु नहीं देखतीं ! बातचीत बन्द है, वदनसीची काम बन्द हो गया ? नहीं, चह्दुत दी खुशक्लिस्मती से | अरे ! मुझे अकेला छोड़ दो

गदूगद्‌ परमानन्द क्री यह निरन्तर तरंगमाला। फऐे प्रेप | इस चलने दे | परम रुखचिकर पीड़ा।

2 एक फय एणपंधंगष्ट !

(0 जग 486एए ४४ !

(200 ए00 #8/6 0॥0 79806 !

सकाण्पा8।! ०78९75९.

725287208 ! उाश्त्ातं2685.

278 76४४ ६0ए8 6 ७४० 07 ]76 $

90शा6 बगते 8060808, क6 9007" उप्राष्टी ०४5!

पीछा 866 पा6 800 9986 ०पा'8१ दाशंए 070॥6893,

पत्र मच्जूषा, २४

हुक 68४88 8 88078वं 5प्र7'९मां 09५, वुव एंथए४पीत९58, स0 870ए8 #एते 870एछ४8, १8 068, 4॥ 0ए९7098 |8 97775 00£ 8९0888 कषा)पे 06 707 78008. 89769058 |7 2! ६6 ए07ेते ७90 ॥0ज़ह8, प्रणतातेक्ा68 40 छगोते #९908९. 00 वी098, 06 9ता, ॥0 तैए 7086, की07 ह8 806 ए7ए8788 ,00 7'0]], 2. 0॥त5 छातते तै९8॥8 707" (98. मसछा& ९णाह5 8पएछएए ए0०0प67 पतंग 8॥85, 86008 ९०7068 70॥#8 8प्रश॥७7, है 0

लिखने से दूर !

व्याख्यानवा ज्ञी से परे !

कीर्ति ओर नाम से कोई काम नहीं

सम्मान ! बाहियात

अपमात | निरथक |

कया ये खिल्लोने जीवन का उद्देश्य हैं ?

तके ओर विज्ञान, विचारे प्रमादी ( गड़बड़- करी ) ! उनको मुझे देखने दो और अपना अन्धापन सिट्ाने दो स्चप्नी से एटा पावन घारा बहता है, जागृत अवस्था से बद्द बढ़ती ओर बढ़ती है कभी-कभी वह इन्द्रियों और विनाशशील वलुके तटों से डउमछ जाती है। चह सस्पूर्श संसार में फेलाती ओर बहती

२६ स्वामी रामती्थे.

उद्दाम ( ७१0 ) शान्ति में चह प्लाबित करती है। इस के लिये, सूर्य नित्य उद्य हुआ, इस के लिये विश्व ज़रूर लुढ़का, सब जीवन और मौत इस के लिये | यहां आता है जोर कल्लोल करता हुआ विस्मय रूप -< . तरंग्रित कल्याण | यह आता है गरज़ता हास्य रूप मोन नब्न्नन-ईफ०न लव श्री: र्टलेंड ओर, श्रीमती ई. सी. कैम्पवेल, डेनवर, कोलेरेडो

जब लोग किसी वस्तु पर अपना दिल लगाते हे, ओर विघ्न पड़ता है, तब दे व्याकुल ओर बेचेन होते है। प्रतीत दोने वाली चुराई के प्रतिरोध करते की पद्ुत्ति, बिना अपवाद के, संच्तषोीभ ओर उत्पात का कंरिण है। इस प्रकार, क्‍या आप नहीं समभती कि दृजरत ईला का सिर ठिकाने पर , था जब उसने कहा था के “अखत्‌ वा पाप का भात्तेराध करो", ! अपने आप की शान्त, बिलकुल खुश रकखो, ओर अपनी इच्छा की धारा के विरुद्ध जो कुछ . प्रतीत हो उसका उल्लासपूर्मयक स्वागत करो जब हम अपने चित्त की स्थिरता नहीं नछ्ठ होने देते और स्वरूप ( आत्मा) में केन्द्रित रहते हैँ, तव, राम ने सदा अपने निजञ्ञी अनुभव से देखा दे,कि प्रतीत होने वाली चुराई भल्ाईम बदल जाती है। फ्या तुम्हें याद नहीं हे कि एक भतीत होने बाली चुराई के बाद वह दश रुपये क्विस प्रकार एक हिन्दू दिद्यार्थी को

पत्र मच्जूघा. जज

भेजे गये थे? किन्तु बद्मिज्ञाजी और वेखेनी से सब कल्याणों, उत्कृष्ट विचारों ओर हमारी राह देखनेवाली खुश नसीधियों का द्वार हम अपने लिये बन्द कर लेते 6 | सब बुराई और कठिनाइयों को उस चित्त से जीतो देद और सांसारिक जीवन को अपने हाथ की हथेली पर लिये हुए हो; दुसरे शब्दों में,प्रेम पूर्ण चित्त की अंरपण करके, ( जिससे बढ़कर कोई उच्चतर शक्ति नहीं हे ) आप हंस दोष को ज्ञीतो ३० !

तुम्दारा अपना प्रियात्मा 2 ॥५०.*| राम स्वामी के रुप मे

पोटे ल्ले र। श्रीमती ई० सी० केस्पबेल, डेनवर, कोलोरेडो आप निरन्तर राम से याद की जातो हो। 85 ] 82 |] 3४ |! आप अति सच्ची, पवित्र, अष्ठ, एऋशग्नचित्त, श्रद्धालु, ओर बड़ी ही भत्ती हो ! क्या ऐसी नहीं हो

(0) 70 6०7फ्&"/8 07 6०ग्बर्ड .रा8 90807 पा का0007 ३7 दाल ख्ांग्रव

(2 0 600ए9878७ 07686 एांगि द0ए 7०१४ ९४8 37067/98/9,

(9) ॥0 6007878 6 7९8९४ एप ई8 98४6 के 87006 0ए७/ श6 मराह्या07ए 98४86 77४9788,

(4) 70 १एशी प008 #परापा'8 फॉब्राड क्ा्े ९87 क्षय 778,

छ'

श्य स्वामी रामती्थे-

(8) 70 56६ 007 ॥687 00 70५ फ्रांग्रड् 7प 6 076 90]77076 ६8७५9,

(6) 70 व्ुक्षाते णा 0पॉफएका'पे 2]0]06९8/'क00९8 00 70: $0 0806६) 006ए8 47 ६06 १7)767 पते &ए70075 #6 7प९8 0५४७०' ७४७7४ 7798,

(7) 790 0००७ एफ ॥/0 ४#78 6०एटीप्रछ॑078 7070॥ 6 9749, 0" 86९४08 ००श्दपप 0 00 9९०76 ध्ाते 790॥ $0 ए€४ #7070पथ्राए 8४॥9गी९वें एप ईकती-: ॥॥ 6 डिएांएणंपक्षे ,8ए,

(8) ॥0 9९ 60 ब897'8ए ६00 787 9 ९07ए७/8807 ४) $॥8 १600|6. |

जु६ 48 एंड व्कक 0970808 0800767 77 ००76१४ ज़ांगप, 0४078 8एा7 (686९ ९70 80072९8 07 (70प06, 007 !

१.सन में एक मनुष्य की दूसरे से तुलना या मिलान करना

' २, सनसे छापने आप की किसी दूखरे ममुष्य खे तुलना करना।

चतेमान का भूत से मिल्लान करना ओर पिछली

भूलों की याद में रंज करना ४. भावी तरकीयों के मनसवे करना और प्रत्येक बात से डरना।

४. एक परम तत्त्व वस्तु के लियाय किसी ओर चबर्तु मं चत्त लगाना

६. बाहरी झूपों ( दिखलावों ) पर आश्रय करना और

३० स्वामी रामतीर्थ-

तक हम दुनिया के सब रोगों को निमंत्रित करते हैं देदद