हिन्दुस्तानी एक्ेडेमी, पुस्तकालय

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| श्रीजेनेन्द्रकुमारक्े लेखों, निबन्धों, व्याख्यानों, अश्नोत्तों और पत्रांशोंका संग्रह है

सम्पादक

ओऔ प्रभाकर साचवे एम० ए०, साहित्यरत्त

है कजान ताज 3 “3८धट पीट #ी5

अकाीशक

हिन्दी-ग्न्थ-रत्नाकर-कार्या छय, बस्बई

प्रकाशक-- नाथूराम प्रेमी, हिन्दी-अन्य-रुनाकर कार्यालय, दवीराबाग-बम्बई

दिसम्बर, १९३७ मूल्य तीन रुपया

मुद्रक--- रघुनाथ दिपाजी देसाई न्यू भारत प्रिंटिंग प्रेस, केलेवाड़ी, गिरगांव, बम्बई

वक्तव्य

इस किताबके नामसे शंका होती है कि जेनेन्द्र कोई व्यक्ति होगा जो अपना जीना जी चुका है। मिट्यी उसकी ठंडी हुई। बस, अब उसको लेकर जॉच-पड़ताल और काट-फाँस होगी पाठक निराश तो कदाचित्‌ हों, पर सच यह है कि अभी वह समाचार सच नहीं है। जैनेन्द्रके मरनेकी खबर अमी मुझको भा नहीं मिली | पाठकको मृकसे पहले वह सूचना नहीं मिलेगी इसमें आग्रह व्यर्थ है | फिर भी, उसके जीते जी यह जो उसकी इधर-उधरकी बातोंको ऑकने ओर भेदनेका यत्न है, यह क्‍या है ? ठीक मालूम नहीं, पर यह ज्यादतों तो है ही। इस कर्मका मूल्य भी आनिश्चित है / बहते पानीकी नाप-जोख पक्की नहीं उतरेगी | उसके बँध रहनेकी ग्रतक्षा उचित है। फिर भी आदमसी है कि चेनसे नहीं बेठता | जाविन-मुक्तिके निमित्त उसके नियम पाना ओर बनाना चाहता है, ओर उस निभित्त उसी जीवनकों पेरोंसे बाँघता-कसता है | यह मानव-पद्धति विचित्र है, पर आनिवाय भी है तो क्या किया जाय ? उपाय यही है कि अपने ऊपरकी शल्य- क्रियाकों सहते चला जाय | उपयुक्त असलमें यह है कि आदमीके- मरनेपर उसके बारेसें कुछ लिखा जाय

इस पुस्तकमें छापेकी अशुद्धियाँ भी रह गई हैं। वे अशुद्धियाँ भावके साथ मनमानी करती हें पर अशुद्धि-पत्र पस्तकके साथ देकर उनका ढिंढोरा पटना भी ठीक नहीं लगा अशुद्धियों रह गई तो इसलिए कि कुछ लेख सीधे अखबारोंसे पुस्तकें ले लिये गये

दो भाषण तो भाषणोंकी अखबारी रिपोर्टे हैं। फिर भी प्रकाशककी आतिशय सावधानाके कारण अशुद्धियों कमसे कम रह पाई हैं |

चर ७५

दरियागंज | जैनेन्द्रकुमार दिल्ली / २०१ १२७

शआरीजनेन्द्रकुमार

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भूमिका

जअथत;।

आइए, जैनेन्द्रके विचारोॉपर कुछ विचार करें। ख्याल रहे, विचारोंपर हमें विचार करना है, नामवाले जैनेन्द्रपर नहीं,--अमुक नाम और अमुक घामवाले जैनेन्द्र इस कारण विचारणीय नहीं हैं | क्या वह एक दिन नहीं बने, ओर एक दिन भिट भी नहीं जायैंगे ! पर हैं विचारणीय तो इसीसे कि उनके द्वारा कुछ वह व्यक्त हो रहा है जो सतत प्रवहमान है,--परिणमनशील, फिर भी चिर और स्थिर भाषामें उसीको कहें विचार विचार सूक्ष्का आकलन करता है, जैनेन्द्र तो स्थूछ माध्यम हैं

पर कोई पूछे कि विचार क्‍्यें। करना है? तो उत्तर है विचारशीलताके विंकासके लिए, मानवताके विकासके लिए, जगतके दुःख कम करनेके लिए, आनंद बृद्धेंगत करनेके लिए |

अब यह किताब, जिसमें लेख, भाषण, प्रश्नोत्तर आदि कई रूपोंमें विचार मोजूद हैं, हमारे सामने है। हम उसमेंकी विचारात्माका किंचित्‌ तठस्थ और विवेकशील दृष्टिसे एवं संख्ठिष्ट रूपमें देखना चाहते हैं। उसमें प्रकृत-तत्त्वको ही हम देखेंगे अर्थ-तथ्यको औरोंके लिए छोड़ देना ही मरा है | हम पहले यह देखें कि विचारक जेनेन्द्रक मूलमें जो कछा-भावना है, उसे कहँँतक गुंजा- इश देनी होगी, उसके मानी क्या हैं, फिर इन विचारोंकी भित्ति जिन मान्यताओं ओर समस्थाओंसे बनी है उसे देखें, फिर जीवन और साहित्यके अलग अडछग पेमानोंमें उन्हें ढाल और अन्त कुछ अपनी ओरस कहकर इस विचारकपनको मावमयतामें छोड़ दें। हम विचारोंको "७७१ करें उन्हें [068] करनेके मोहसे बढ़ें | चर) ७. चर 8". जननद्र कलाकार आर विचारक

कल्य ओर दर्शनका नाता बहिन-मभाईका रहा है दोनें।में आजके युगर्मे किसी

द्‌

प्रकारका अन्तर डालना खतरेका काम है। शनि जब कहा कि आजकी सदीके कलाकारके।| अंततः दाशनिक होना ही पड़ेगा. तब उस कथनमे आत्म-रक्षासे भी अधिक कुछ तथ्य था। वस्तुतः कलाकी मंदाकिनी दर्शनके शुरु-गिरिसे फूट कर काल और परिश्थितिके बीहड़ वन और मेदानोमेंस बहती हुई सर्मष्ट गत अमेदानुभूतिके महासागरमें मिलने चक्की जा रही है। वह चिरंतन- गतिशीला ओर वेगवती है; अतः भद-मंथन उसका आदि, अमेद-लाभ अन्त, और प्रेरणा मध्य माना जा सकता है

यहाँ * कछा के अर्थ समझने होंगे। टालस्टायने जिसे समस्तके समीप आनेका भाव-माध्यम बताया, इमरसन जिसे देवी गुण मानते थे, हेंगेलने जिसे * आत्म- सोन्दर्यकी अभिव्यक्तिका महत्यथ कहके संबोधित किया, उसी कलाका भत्ा हम भौतिक और जड़ ऐन्द्रिय छालसा-पूर्तिका साधन किस भाँति कह सकते हैं ? वह मुक्ताकाशमें उड़ते रहनेंको नहीं है, घरतीसे वह चिपटी है। जो खारे जीवन-सागरसे आत्म-सूर्यकी तेजोमयी किरणोंद्वारा गगन-प्रांतरमं खींच ली जाती है, कछा उस वाष्प-सी है। यथार्थस ऊपर आदंशकी ओर उसका गेह है। क्षार सब नीचे छूट जाता है, शुद्ध तेज ही वहाँ रहता है फिर वही वाष्प ताप-मानकी अनुकूलता पाकर पानी बन नीचे बरस रहती है और हरियाली ऊउपजाती है | बरसनेसे पहले वह सघन भी है, ताड़ित्पूर्ण, हुंकार और वेदनासे भरी ओर उसमें कभी तड़ित्तजन और घन-गर्जनका भीष्म-सौन्दर्य दीखता है, तो कभी सप्तरंगी धनुषका इन्द्र-सोन्दय भी उसीसे बन आता है| मानव-कब्पना उस सोनन्‍्दर्यकी पीकर पीन हो उठती है। फिर भी यही उस महा-व्यापारका आशय मान तृप्त होना भूल है। धूपस तपी ओर प्यासी घरती-माताकी छातीपर विर्हाकुछ वह सघन वेदना सहरसत सहरल धाराओं पानी बन बरस पड़े,--- हो सकता है, कि उस तमाम ( कला ) व्यापारका निहिताशय यही हो | क्‍या इसीका परिणाम नहीं है कि धरती-माता मानें। प्रत्युत्तरमे, हरियाली ओढ़नी ओढ़, असंख्य शस्य-बालियोंसे सुनहरी मुस्कान मुस्कराती हुई खिल पढ़ती है !

कलाकी अवतारणा, रूपककोी तजकर कहे तो, जीवनके अभाव-हिद्रोंको आत्म-स्वरकी रागिनीसे मर देनेके लिए होती है

वैसे तो मानव स्वयं एक अपूर्ति है। परन्तु जिस अनुपातमें वह अपूर्ण है उसी अनुपातमें उसमें 'पू्णात्यूणमिदम की ओर अग्रसर होनेकी प्रवल आकांक्षा

भी विद्यमान है | विकास अथवा उत्क्रान्तिका इससे अलग कोई अर्थ नहीं। जीवनके धर्म-क्षेत्रम एक ओर मानवात्मारूपी सत्य-प्रिय पार्थ ओर दूसरी ओर प्रचंड अनीक-सजित स्वाय-प्रिय दुर्योधन-दुःशासनके बीच संदेव समर चलता रहता है। अच्युत काल इस सब लड़ाई-झगड़ेकें बीचमें केवछ फलेच्छा- विरहित परन्तु आत्म-योग-मय कर्म-लमताका आदेश देता है | कला उस संघर्ष- रतिका घारण करती और उसके विष-फलका द्योतन करती है। वहँ चिन्तन है संजय वेसे दोनों ही अपने आपमें साध्य नहीं हैं,--न चिन्तन घारणा। साध्य परात्पर है| परात्यर कृट्स्थमचलं श्रुवं है और वही सत्य है |

भावगम्य ओर बुद्धिगम्य शान अपने-आपमें परिधित हैं | हम उनके सहोरे जब अपरिमेयकी ओर बढ़ते हैं तब दिल ओर दिमागंस एक तरहकी कशमकश शुरू हो जाती है | बुद्धि कहती है, में पहले देखूँगी ओर जानूगी लो मैंने जान भी लिया | वह ( अपरिसेय ) यों है, और यो है।” भक्ति-मावना कहती है, देखनेको मुझे आँखें कहाँ हैं ? देखनेको मुझे कहाँ जाना है ! मैं दूरका दूर नहीं जानती--छो, मैंने चरण गह लिये हैं, में उसे पा गई हूँ। ' जब यह इन्द्र चल रहा होता है, तभी मानव-विवेक सहसा वहाँ पहुँचता है ओर निणैयात्मक स्वरम मानो साधिकार कहता है, री पगली बहिनो, ठुम दोनों ही अध-सत्यकों गहे उसीकों सम्पूर्ण माने बैठी हो। भूलकी असल गाँठ, मुक्ति-बोधकी राहमें असल बाघा, तो इस : में में * में है, जिसके प्रयोगसे तुम दोनों बाज़ नहीं रही हो | *

ओर यही वह अहं-भावना है जिसके विरुद्ध जैनेन्रने, समष्टि-प्रेमकी मित्तिपर खड़े होकर, खुल्लमखुल्ल विद्रोह घोषित किया है | उनकी हरेक कृतिका रोम रोम आत्मोत्सग ओर आत्म-दानकी इस महत्‌ भावनासे परिष्ठावित है | जहाँ सांख्य दाशनिक प्रक्ृतिके चेतन-वत्यके पुरुष-सेपर्कके साथमेँ बुद्धि-तत्व और अहंतत्त्व- के सुजनकी बात करते हैं वहाँ जैनेन्द्र प्रक्रतितकसे आत्म-समपंगकी सीख लेना जरूरी समझते हैं ( पृष्ठ २)। २७-३-३७ के एक पतन्नमें उन्होंने लिखा है-- तुम जानते हो कि आर्टिस्ट निर्मम नहीं हों सकता ! ऐसी घारणा गलत है। ज्ातव्य वस्तुके संबंधर्मं उस ममताहीन वैज्ञानिक होना चाहिए।। हैं, ज्ञातव्य उसके लिए है वह स्वयम्‌ , “पर” नहीं | “पर” को तो जाना ही नहीं जा सकता | जाना जा सकता है तो स्वयम्‌ के भीतरसे | इसलिए, वह अपनेकों

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और अपने ज्ञानकी भी बराबर कसता रहता है। सच्चे आर्टिस्टको अपने जीवनके बारेमे शुद्ध वेज्ञानिक होना पड़ता है। इसलिए “पर ' के प्रति है वह भावुक कलाकार, ओर अपने प्रति है परीक्षा-प्रयोगी तत्त्वान्वषी | जहाँ में वस्तुको शोधना-बिठाना चाहता हूँ वहाँ होना ही चाहिए मुझे गणितशकी मॉति सावधान | जहाँ स्फूर्तिदान एवं चेतन्योत्पादन लक्ष्य है, वहाँ होना होगा कछाकार।

: जैनेन्द्र हिन्दी-संसारके सम्मुख परख के कथाकारके रूपमें आये थे। उनकी कथाओंने हिन्दी-भाषियोंके ध्यानकी सहसा आकृष्ट कर लिया, क्योंकि जैसे कि स्व० प्रेमचंदजीने हंस” (वर्ष संख्या४) में लिखा था, उनमें ““अन्तः- प्रेणा और दाशनिक संकोचका संघर्ष है,---इतना हृदयका मसोसनेवाला, इतना स्वच्छन्द और निष्कपट जैसे बंधनोंमें जकड़ी हुई आत्माकी पुकार हो।...... उनमें साधारण-सी बातकी भी कुछ इस ढंगस कहनेकी शक्ति है जो तुरूत आकर्षित करती है। उनकी भाषामें एक खास लछोच, एक खास अंदाज है। ?” धीरे धीरे कथा-शिल्पी जेनेन्द्र विचारकके रूपमें सामने आने रंगे और परसों मेरे एक मित्रने मज़ाकंम यहाँ तक कह दिया कि “अब वे सूत्रकार होते जा रहे हैं ।' आशय, जैनेन्द्रकी मनोभूमिमें कल्यकारते दाशनिककी ओर बढ़नेवाल्य विकास चिन्तनीय चीज है |

यहाँ मुझे नवंबर ३६ के “हंस में प्रकाशित अपने लेखके कुछ अंश उंद्घृत करना आवश्यक जान पड़ता है बस्तुतः जैनेन्धमें, क्या जीवन और क्या साहित्य, घर ओर बाहर, व्यक्ति ओर समष्टि, एक दूसरेके प्रति चिर-अपेक्षा- शील रहे हैं। जैसे एकका दूसरेके विना अस्तित्व ही असम्मव है। पर फिर भी उसमें व्यक्ति और घरवाला ( यानी समाज-सम्मत व्याक्ति-केन्द्र-बोधक ) जो तत्त्व है वह दूसरेके ऊपर अधिक अधिकारसे रौब जमाता हुआ चछता जान पढ़ता है। यही लोकेक ओर अव्गोकेक, वास्तव और सत्य, अनेक और एकका जो भेदाभेद है वही जैनेन्द्रके व्याक्तितकी विशेषता है |. . .जेनेन्द्र ऐसी सुल्झन हैं जो पहेलीसे भी अधिक गूढ़ हों। वे इतने सरल हैं कि उनकी सरलता भी वक्र लगे | वे इतने निरभिमान हैं कि वही उनका अभिमान है वे परिश्यितियोंसे ऐसे आबद्ध हैं कि उसीमें उन्होंने अपनी मुक्ति मान छी है।”

अर्थात्‌ जैनेन्द्रमं विचारक कलाकार, अपने कलात्मक और विचारात्मक अस्तित्वको, किसी भी प्रकार, कभी, कहीं भी, जरा भी एक दूसरेसे अछग देख पाता है, ओर रख ही पाता है।

९,

मान्यलायें ओर ससस्याय्थे (ि/७77868 एवं [2/00!0798)

यह तो निविवाद है कि जैनेन्द्रकी ही क्या, प्रत्येक चिन्तनशीलछ लेखककी कुछ मान्यतायें हुआ करती हैं | ऐसी भूमिके अभावम लेखक स्थिर नहीं खड़ा रह पाता ये मान्यताये विकास-प्रवण अवश्य होती हैं, पर तैरती हुई नहीं भगवान बोधिसत्त्वकी दुःखकी मान्यता ही उनकी प्रथम ओर अन्तिम समस्या बनी रही | जो मान्यता अन्ततः प्रश्नोन्मुखी नहीं है वह जीवनके अभावमें केव5 मृत धारणा (-90027708 ) हो जाती है मुम॒क्षु जैनेद्रकी मित्ति तो ऊपर ऊपर तैरती हुईं है, ओर जड़ निसस्‍्पंद है। उनके बिचारोंका खोतोद्वम प्रत्यक्ष जीवनंस होनेके कारण उसभे कभी जम जाने ( >छ92708४07 ) की संभावना रह ही नहीं जाती | इतनी पूर्व-सावधानीके बाद जैनेन्द्रकी समस्यात्मक मान्यताओंकों तीन नजरोसे देखें--मनोवेज्ञानिक, आचारशाख्रीय (++08/!) और आध्यात्मिक

जैसा कि आजकलके कई पाश्वात्य लेखक मानते हैं जेनेन्द्र मनोविज्ञानका साध्य नहीं मानते उनके लिए वह साधन है। जिस मनोविज्ञानको जेनेन्द्रने अपनाया है, वह तो बर्त्ाववादियों ( “3७)8ए 00५80 ) के जैसा ऊपरी ऊपरी ही है, ओर मानस विश्लेषणवादियों के जैसा निरर्थक-विच्छेदक, बालकी खाल निकालनेबाला ही है। उनकी मनोविज्ञान-मान्यता समग्र-संपन्न ओऔर गत्यात्मक है। वे प्रवृत्तियोंको महत्त्व नहीं देते, सो नहीं, परेतु माशियाँ बर्गसॉंकी थिअरीके समान ही प्रकृति और मनके (+-४(७/087 800 777५ के) विषयमें उनकी विचार-धारा परस्परापेक्षाशील रही है। वे स्वप्तको गोण नहीं समझते, ओर अनेक व्यर्थताओका अपने सचेतन स्वप्लका कोई भाग ही बनने दते हैं | बुद्धिस पूर्व वे भावकी सत्ता मानते हैं। इसी कारण उनके लेखामे,---यथा रामकथा कहानी नहीं / उपयोगिता नेहरू और लनकी कहानी . आलोचकके प्रति आदिमें, माव प्रधानताको, या सुबुद्ध विवेकशीलताकोी, समस्त कम-प्रेरणाका मूल बिंदु माननेकी ओर सशक्त संकेत है। साथंश, जैनेन्द्रका: मनेविज्ञानिक आधार जैन-तर्क-पद्धति स्थादवाद * से अनुरंजित होनेके कारण अत्याधुनिक गेस्टाल्ट-पंथी मनो-विज्ञानिकोंके समान संक्ठेषमय (-+>5ए॥४०४0 ) हो जाता है | साथ ही साथ उसमें बेनेडेड्े क्रोसेकी

सान्दय॑-समाक्षाके मुलम रहनेवाली अमभिव्याक्ति-प्रधान स्वनात्मक कल्श-क्षणकी कल्पना भी पयोप्त अशमे क्रियमाण रही है

१७

मनोविज्ञानिकके लिए जो बातें पहेली बन प्रस्तुत ह्वोती हैं, उन्हें जैनेन्द्र जेसे कलाकार किस सहजताके साथ सुलझा डालते हैं, इसके प्रमाण-रूप कई लेख इस संग्रहमें हैं। एक लेखनुभा कहानी, कहानी नहीं, * ही छे के स्वयं कथनके ( >(070]0206 ) रूपमें अमीरके मनका चोर किस मजेसे पकड़ा गया है ! जैनेन्द्र जहाँ आलोचक होकर प्रस्तुत होते हैं, वहाँ भी ध्यान देनेकी बात यह है कि वे अपनेमेंके कलाकारका नहीं खोते। प्रमचन्द जीकी कछा, रामकथा,” अथवा नेहरूजीके आत्मचरितपर लिखे गये लेख इसी कलात्मक आलोचना शेलीके मनोहर प्रमाण हैं | वस्तुत: आल्गेचनाका आददी भी वही है जहाँ आलोचक मनके रसको नहीं खो देता, जहाँ वह एक-मात्र बुद्धिवादी बनकर विश्लेषणको ही प्रधान और अन्तिम कर्तव्य नहीं मान बैठता आखछोचनाम भी क्‍यों आत्म-रस-दान ही प्रधान हो ? इसी विचारको जैनद्धने अपनी प्रमुख दृष्टि मानकर सदा सामने रकक्‍्खा है। ( ४९-६४ )

ऊपर जो कहा गया है कि जैनेन्द्र निरी बुद्धिसि अधिक सर्वस्पर्शी-माव-भूमिको अपनाते हैं, उसका अर्थ विवेकशासित भावनाओंके अर्थ लेना अधिक युक्त होगा क्योंकि वेसी निरी भावनाके शिकार बननेमें वे सुख नहीं लेते, वह तो पुनः एक अन्धस्थिति है। परन्तु प्रेमकी भावनाको या कहो सर्वव्यापी सहानुभूतिको ही जैनेन्द्रन जैसे अपने भीतर रमा लिया है। इसीसे वे उस उन्नत शालीनताके साथ अश्लील्ताके भौतिक प्रश्नको छूत दीखते हैं ( प्ृ० ४२ ) कि जिससे दुश्चरित्रा ठहराई हुई और यहूदियोंद्वारा पत्थर फेंककर सताई गई स््रीपर इंसाके करुणा-द्रवित होनेकी, मदरासमें वेश्याओंके सम्मुख मगाँधीजीद्वारा दिये गंये करुणा-राजित ममतापूण माषणकी, अथवा बुद्ध और सुजाताकी कथायें आँखोके सामने खड़ी होती हैं। सच्चा कलाकार इसी अन्तिम सत्यकी अल्योकैक भूमिपर खड़े होकर, छो।किक सुन्दर-असुन्दरंक भेद-अन्तरको आँखोंके सामने बिलमते-बुझते देखता है | अरे, सत्यकी महादर्शिनी आँखेंके आगे ये भेद-माव कहाँ बचे रहते हैं ! दुर्बछ मानव-मन-निर्मित मूल्य-भेद जहाँ जाकर एकमेक हो जाते हैं उसीको आध्यात्मिक या आधिदेविक दृष्टिकोण कहते हैं

आधिभौतिक आचार या नीति-अनीतिके रूढ बंघनोंकी कीमत कूतनेवालिः शास्त्र (--एथिक्स ) को समस्‍यायें भी इसी तरह जैनेन्द्रके लिए, बहुत कम कठिन रह जाती हैं। जैनेन्द्र क्या, प्रत्येक सुबुद्ध लेखक अपनी कार-परिस्थितिकीः

र्र्‌

मर्यादाओंसे बाहर जाकर बात करता है; वह एक प्रकारका नीर्डिप्त फकीर ओर द्रश ही होता है ( प्ृ० १७ ) इस दृष्टिस उसका उत्तरदायित्व कम नहीं होता उसे अपने समाजकी स्थितिको अपने साथ आगे बढ़ा ले जाना होता है; अथीत्‌ , उसे कीमतें बदलनी होती हैं| अब कीमतें बदलनेके दो तरीके हैं

एक तो वह है जो आधी-सा है, जिसे क्रान्ति कहते हैं; दसरा वह जिसमें लोगोंको किसी भी तरह खदेडा, कुचला या अप्रेमसे अपनी भूमिपर जबर्दस्ती ( यानी हिंसाकों जगह देकर भी ) खींचा नहीं जाता, बालक प्रेम ओर समझावेसे त्याग ओर भलेपनकी अहानिकर और अहिंसक तथा नम्र और विनीतपद्धतिसे मनवाया जाता है| क्योंकि जहाँ दृढ़ हृदय झकता है, वहाँ उस झुकनेके

द्वारा क्या उतनी ही दृढ़ताके साथ वह ओरोॉके हृदयको मी नहीं झकाता !

परन्तु जरूरत सिफ इतनी ही होती है कि वह दृढ़ हृदय इतना प्रेमसे छबालब,

करुणासे ओत-प्रेत, इतना अछग एवं ध्येय-मय-विरागपूर्ण हो कि जिसमें राग- द्वेषको पास फटकनेका अवसर तक मिले यही कठिन और कश्ठेंस भरी दसरी राह जैनेन्रने अपने लिए चुनी है | उनका मूल्यान्तरीकरण ( -+78४85एशप8- ४07 ) नीछोके समान दुर्द्धप विद्रोह, हिंसा, और जिघांसापर नहीं खड़ा है

जहाँ जमाना क्रान्तिके नशेमें कोरे पराये शब्दोंके पीछे अपनेको खोनिको तुला है, वहाँ जेनेन्द्रकी यह निष्कपट निष्ठा सराहनीय ही नहीं वरख्व महत््वशाली है। इस दृष्िसि * प्रगति क्या यह एक पढ़नेकी चौज है।

2 2, 2५

जेनेन्द्रके विचार-लोकपर वंदनीय गाँधाजीके सिद्धान्तोंका गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है अहिंसा, सत्य ओर अपरिग्रहकी सिद्धान्तत्रयीको जेनेन््रने भी जैसे आधारके तौरपर पूरी तरह अपना लिया है। इसकी इश्शनिश्तापर तर्क करना स्थऊ् ओर विषयकी दृष्टिसि यहाँ अपेक्षित नहीं

मिसालके लिए कर्मसंबेधी महत्त्वपूर्ण प्रश्न ही ले लें। घमोस्तिकाय ओर अधर्मास्तकायके समान उनके द्रव्यानुयोगमें विभेद नहीं ओर वे जीनो या पारामिनाइडसके समान स्व-स्थिति-मय किंवा हेराक्नाइट्सकी तरह स्वंगतिमय ही होकर किसी वस्तुके अध सत्यकों पकड़कर ही चलते हैं। यहाँ जैनेन्द्रकी 'एक केदी' कहानीके कुछ वाक्य देनेस स्पष्टीकरण होगा; सत्य स्थिर है, घिरा नहीं है, अनुशासनसे परिबद्ध काछ भी सत्य ही है; कार जो बनने और मिटनेका-

९२

आधेय है। अतः स्थिरता सिद्धि नहीं, गति भी आवश्यक है | जीवन अस्तित्वंसे अधिक कर्म है। अब इसी कर्म-प्रश्रोाता जिस तरह गीतासे * स्वमावस्तु प्रवतति/ कहा गया है, जेनेन्र भी “आप क्‍या करते हैं” जैसे 'बाह्यतः बुद्भधपमस भर दीखनेवाले निबंध, इस मजेदार सरलतासे प्रति- पादित कर डालते हैं कि देखते ही बनता है। किसी इन्हयोरनस एजेंटके आग्रहस चिढ़कर ही जनेन्द्रने इस छेखकी सृष्टि कर डाली थी, बे» तो आचार-शास््रसंबंधी कई प्रश्नोंका समाधान मेरे द्वारा किये गये विविध प्रश्गोकी उत्तरावरीमें, जो पुस्तकके पीछे दी है, मिल जाता है। तो मी व्यत्रसायका सत्य 'उपयोगेता' 'भेदाभेद, आदि लेख भी इसी दृष्टिसि पढ़े जाने योग्य हैं। यहाँ एक मार्केकी बात है कि जैनेन्द्र कमी सामान्य समझ ( (00॥707 88786 ) की भूमि नहीं छोड़ते। वह जेन मुनियोंका-सा कर्न-संवर और करमनिजरका अउंभाव्य उपदेश नहीं देते। जो भी हो, अपरिश्रहको वे एक राष्ट्रीय आवश्यकता समझते हैं |

अब आइए. जैनेन्द्रके उस प्रिय छोकमें जहाँ उनको बारम्बार उड़ उड़ जाना भाता है | पुस्तक-समीक्षा तकमें जो अध्यात्म-भूमि उनसे नहीं छूटती, उसीके 'विषयमे कुछ कहें। क्या वहाँ कुछ भी कहना चलेगा ! शब्द भी वह बन्धन हैं | < मानवका सत्य, _ सत्य, शिव, सुन्दर, _ * कला किसके लिए, * मुझे भेजे £ पत्रांश दूर ओर पास, _ निरा अबुद्धिवाद ' आदि इसी दृष्टिति लिखे गये सुन्दर निबंध हैं। जेनेन्द्रकी, जीव, द्रव्य, आत्मवरेण्यसंबंधी विचारावलीपर जैनधर्मकी छाया उतनी नहीं जितना वेदान्तका प्रमाव है उसे पृ॑तः वेदान्त भी कहना गलत होगा वह तो एक तरहसे सर्वताधारणका छोक-घर्म है। बे « अनुभव में विश्वास करते हैं। श्रद्धांके एकमेव साधन होनेकी बात भी स्वीकार करते हैं। संसारके आदि और अन्तकी बात साधारण जनको ज़्यादह उपयोगी नहीं, और ऐसी अलिप्त ओर विच्छिन्न एवं वादग्रस्त समस्याओंमे वे नहीं पड़ते कुछ तक-प्रधानता अपने एक पत्र ' में उन्होंने अवश्य अंगी- 'कृत की थी | परन्तु, वैसे उनकी साधारण विचार-भूमि व्यावहारिक वेदान्तकी अथवा आवश्यकीय साधारण समझदारीकी है। रीड आदि स्क्ॉठिश दाशनिकोंके समान उन्होंने (१0707707 8९78९ को ही पुनरुज्जीवित, स्पष्ट और अमिव्यक्त

किया है। इसीसे में जेनेन्द्रके विचारोमें जनताके साथ कई दशाब्दियोंतक टिके रहनेका क्षमता पाता हूं।..

रे

परमात्म-तत्तवके विषयर्म जैनेन्द्रकी आस्तिकता कुछ अज्ञेयवादियोंकी-सी है | वे तकंसे परमात्माको सिद्ध नहीं करना चाहेंगे | उनके ख्याल्में तो जो है सो परमात्मा है! | उसे वे * अस्तित्वकी शर्त मानकर चलते हैं | जैनेन्द्रकी इस भावुकतामें हिन्दू मर्मियोंकी-सी सारूप्य-प्रधान कातरता घुली हुई नजर आती है जो अत्यधिक माननीय नहीं तो भी सर्वथा मननीय अवश्य कही जा सकती है। जेनेन्द्र श्रद्धालु हैं| वे अपनी श्रद्धा किसी भी चीजके खातिर खोना नहीं चाहते, अपनी श्रद्धापर उन्हें इतनी श्रद्धा है। वे कछा, जीवन, साहित्य,---समस्त विचारोंका अस्तब्रिन्दु उसी सत्य-तत्वकों मानते हैं परन्तु, तो भी, वे परमात्माको अगस और अज्ञषेय ही समझते हैं | सेन्सरने जब शेयवाद और अशेयवादकी मीमांसा की तब उसकी दृष्टि वेज्ञानिक अधिक थी पर जैनेन्द्रकी आस्तिकता थाल्स्टाय या गाँधीके जैसी है जिसमें, विशानसे अधिक, केटके परमात्म-अस्तित्वकी नेतिक आवश्यकताका तर्क हो अधिक कार्वशील है।

यहीं जेनेन्द्रके सत्थ ओर वास्तवके अन्तरकों समझना होगा तर्कशास्त्री ब्रेडलेके भास ओर वास्तव ? ग्रंथमें कहा गया है कि “' वास्तवके साथ मेरा संबंध मेरे सीमेत अस्तित्वमें है| क्‍्येों। कि, इससे अधिक प्रत्यक्ष संबंध में कहाँ आता हूँ, सिवा उसके जिसे में महसूस कर रहा हूँ यानी ' यह | ? ( 'भाय! प्र० २६ ) ओर यहाँ “यह उसी अर्थमें वास्तव है जिस अर्थमें और कुछ वास्तव नहीं है _ (पृ० २२५ ) कुछ कुछ यही स्थिति ज्यूलियन हक्स्‍्ले जैसे वेज्ञानिकनन अपने साक्षात्कारशून्य धर्म नामक पुस्तकमें स्पष्ट की है। यहाँ तक के चेतन मनकी थ्योरी इंजाद करनेवाले विलियम जेम्स जैसे मनोवेज्ञानिक भी अन्ततः जाकर जब जब रहस्यवादी बने हैं, तब तब यह जान पड़ता है कि वैज्ञानिक अथवा तार्किक बुद्धि ही सत्यकी समग्रतासे आकलित करनेका मार्ग नहीं उसे भाव-गम्य भी बनाना होंगा। यहीं हार्दिकता ओर श्रद्धाकी महत्ता, आपसे आप, उद्भूत और सिद्ध हो जाती है। क्‍ क्‍

यहाँ जनेन्द्रके समाश्विदके विषयमें एक शब्द कहना जरूरी होंगा। जैनेद्धके समष्चिधमे आत्म-तत््वका गोण माना गया और भुलाया ही गया है। या कुछ सुधारकर कहें तो सच्च आत्म-बोधमेसे ही समष्टि-बोध जाग्रत होगा ऐसा माना गया है। जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है जैसी सर्वात्ममावकी स्थितिमें पहुँचनेपर मोक्षका, यानी अध्यात्मका, महत्वशाली मसला अलग या दूर नहीं रह _

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जाता डॉ० राधाकृष्णनने अपने निबंधोंमें जगह जगह यह दरसाया है कि हिन्दू दशन व्यक्तिकी उतनी परवाह नहीं करता जितनी तत्त्वकी। पर ध्यान रहें कि यह 'तत्त्व ही अन्ततः ऐसा उदार और व्यापक है कि उसमें व्यक्तिकों अपनी उपेक्षाका अवकाश नहीं है तत्त्व ही व्यक्तिका व्याकित्व है ओर व्याक्ति तत्वके लिए जीता है, ऐसी शखला भारतीय दर्शनमें अव्याइत है मुक्तिके सवाछूपर मुझे एक बार कभी कहीं डिखीं अपनी दो पंक्तियाँ[ याद गंई--- £ इन्सानने हमेशा राहतकी राह पूछी पेगम्बरोंने पूछा--' क्यूँ, कब, कहाँ बँघा है ! ' . गज यह कि खलील जिब्रानने जिस प्रकार आत्म-कमलकी पँखुरी पँखुरी खुल जानेका जिक्र किया है, वैसे ही मुक्ति और बंधन मानवी मनकी धूप-छाया है। हम चाह तो, कब मुक्त नहीं हैं? ओर वेसे झींखत ही रहें तों कब मुक्त हो सकेंगे अन्तम जेनेन्द्रकी विचार-मान्यताओं ओर समस्याओंके बारेमें मुझे यह दुहराने दो कि कल्मकार जेनेद्धने जहाँ अपनी कलम अखंड सहान॒भूतिके जीवन डुबोई है, वहाँ सदा ही स्याद्वादस सैंगकर उसने चित्रांकन किया है पैर चाहे अमूर्तके 38070०7४07 की बात हो, चाहे मूर्त और प्रस्तुत दुनियवी मामली ओर मूल्योपर सूक्ष्म, परन्तु काफी असरदार, व्यंग हाँ,--सब ही जगह ' स्यात्‌ की वह सप्तभंगिमा जैनेन्द्रसे छूटी नहीं है।

जीवन-दर्शी जेनेन्द्र:ः संस्कृति-आलोचना साहित्यिक जैनेन्द्रस भी पहले जीवन-दर्शी जेनेद्धका विचार आवश्यक है। मेरे मित्र अकसर जैनेन्द्रके समाजसंस्कृति-विषयक लेखोंको पढ़कर अजीब . अजीब अनुमान निकालते हैं। कोई कहते हैं वे सोशलिस्ट हैं, कोई कहते हैं वे गाँधीवादी हैं, कोई कहते हैं वे रोम्याँ रोलों हैं। कोई कहते हैं, कुछ नहीं लोगोंका मनोरंजन करते हैं, ब्रौद्धिक कसरत दिखाकर। कोई युवक कहते हैं * रेडिकल हैं ' “रेडिकछ, और एक प्रोफेसर साहबका तो तक है कि उन्होंने छझूक अपना 78770787 ( >लेखनदैली ) बना लिया है और उसीसे, कुछ अधघपके अधपने विचारोकी खिचड़ी, कुछ सामान्यीकरण सिद्धान्त, तत््वचचके

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सामपर लिखते रहते हैं---“ फिलासफर बनते हैं जी !” ओर सबसे विचित्र बात एक आंधी खोपडीवालेने कही--“ ईडियट ? हैं, अर्थात पगले | में इतने अधिक छोगोंके भिन्न मिन्न मतवाद सुनता हूँ और तो भी यह नहीं समझ पाता कि आदमी क्यो चाहता है कि दूसरा वाद भी उसकी अपनी धरणाओंके संचिमं फिट बैठा दिया जाय क्या जीवन किसी कठे नापके कोट जैसी स्थूल और धारणाबद्ध वस्तु है, या कभी हो भी सकी है ! जहाँ जहाँ वह रूप-घारणा-बद्धता है, वह जीवनमें हो चाहे विचारोमें, वहाँ वहाँ हट आता है, यानी अनिष्ट आता है और यह अवांछनीय है | जीवन, विचार, सभी हेगेलके चिर-विकसनशील ,0203 के (>-विचार-तत्वके ) व्यक्तीकरण हैं। इसलिए, कोई जरूरत नहीं है कि जैनेन्द्र किसी इज्म * में फिट हों ही सबसे पहली चीज जो में जैनेन्द्रके जीवन-विचारस्में प्रधान मानता हूँ, वह है उनकी सरलरू-सहज सवसामान्यता। जीवनसंबंधी सभी समस्याओँको इतनी सरलतासे ओर जनसामान्यके बुद्धिमार और पुस्तक-आतंकसे विहीन दृष्टि- कोणसे देखनेकी उनकी क्षमताहीको में असामान्य मानता हूँ | अपने अनुभवकी कीमत देकर जो विचार ग्रहण किये जाते हैं उनमें भ॑ विचारक जैनेन्द्रकी प्रत्येक पंक्तिकों रक्रूँगा उनका प्रत्येक अक्षर ह्ादिक ओर प्रामाणिक है। उन्होंने इस पुस्तकके लेख-भाषण-प्रश्नोत्तरोंमें एक भी पंक्ति सिर्फ लिखनेके लिए नहीं लिखी है। वह जीवनकी गहराईसे उद्भूत, उद्‌्गीर्ण है, ओर उतनी ही गहराई उत्पन्न करनेके लिए. लिखी गईं है तो जग-जीवनके आजेके स्वरूपमे,-मानवतामें, भेद-विभेद बहुत हैं। उन्हींसे पीड़ा भी बहुत है। उसके प्रतीकारंके लिए, उपाय क्‍या? क्या साक्सके कहनेके अनुसार असंतोषकी ओर बढ़ावा देना होगा क्‍या ध्वंस आवश्यक रूपमें विकास प्रस्तुत करेगा स्पष्टत, नहीं। तो फिर क्‍या आदशवादी गाँधीके समान केवल मविष्यकी आशापर निभर हो रहना होगा £ भविष्य-आस्था भी एक दूरीकृत कल्पनांस ज्यादह क्या है ! ओर क्या कोरे स्वारयपर आधारित परजातीय शासनका हृदय-परिवर्तन,--व्यापारी और कूग्नीतिशका हृदय-परिवर्तत इतनी सीधी सादी बात है ! का मेरे विचास्मे, यह मनुष्यतांस बहुत ज़्यादह आशा रखना है | इतिहास ऐसे _ बिस्‍ले, अगुुलीपर गिनने योग्य, सफल आदरोके प्रमाण चाहे दे, पर समष्टिकी

रद

इृष्टिस ऐसी अपेक्षा आकाशकुसुम जैसी है | पर जैनेन्द्रकी भूमिका संतकी ऐसी वहीं हो जाती है जहाँ वे व्यक्तिवादके अनन्यतम समर्थनमें, संभाव्य-असंभाव्य वास्तविकताकी भूलकर, अध्यात्मके वायुलोकमम विहरण करने लग जाते हैं| पर यह भी मुझे बुरा बिछकुल नहीं छगता। क्‍योंकि यह तो सर्वाशतः भारतीय, प्राणतक जिसके भारतीय हैं ऐसा, दृष्टिकोण है।

यह तो भी मारनूँगा कि जिस अर्थथीति ओर भौतिक जड़वादकों समाज- वादके रुपमें पश्चिमद्वारा अत्यधिक महत्व दिया जा रहा है और जिसका यह परिणाम है कि मानवताकी उपेक्षाममें पूर्व उन पश्चिमी धनिकोंद्वारा निर्थक शोषित हो रहा है, वह सर्वाशतः गलत है। हमें व्यक्तिके नौतिक बल विकास करनेकी बहुत ज्यादह जरूरत है इसीसे हमें इस समाजसे मुक्त होना है जो विज्ञाकका शिकार बन गया है | “नहीं चाहिए हमें मशीन सम्यताका यह खोखला

रूप,” यही जैनेन्द्रकी आत्माकी पुकार है।

[क आर. हे का & 5 साहत्यकार जननन्‍द्र * शलाका वाशष्ट्य

और यह पुकार किस सफाई और बुलन्दगीसे व्यक्त होती है ? उनके छेखोंमें उन्हें पढ़नेसे बातचीतका अथवा स्वयं उन्हींत बातचीत करनेका मजा केसे उत्पन्न होता है, यह दर्शनीय है। यहाँ साहित्यके एक अध्ययनशील विद्यार्थीके नाते जेनेन्द्र साहित्य और जैनेन्द्रके साहित्यक विचारोंपर मुझे कुछ कहना जरूरी जान पड़ता है।

प्रस्तुत पुस्तकका आधेसे अधिक अंश साहित्य ओर आलोचनास भरा है। साहित्य क्या, साहित्य और समाज, साहित्य और धर्म,, साहित्य और राजनीति, ताहत्य ओर नीति, साहित्यकार कौन, कैसा आदि लेख, लेखकसंबंधी प्रशो- त्तर कुछ पत्र, और नेहरूजीके आत्मचरित और प्रेमचन्दपर लिखी हुई आलोचनाओंसे मेरा मतलब है। साथ ही स्थान-स्थानपर साहित्य-सभाओंमें दिये हुए भाषण भी उसमें जाते हैं। साहित्य शब्दके निर्माणमेँ जो * सहितता अथात्‌ समवेतता या व्यक्तिमें समष्टिकी उपलब्धिके अर्थ विश्वमें बिखर जानेकी जो अतर्तम लालसा है, साहित्यको उसीका शब्दांकित रूप जैनेन्द्रने माना है। इस 'ष्टिसे उन्होंने उसे विज्ञान या दूसरे ऐसे बुद्धि-व्यवसायोंसे अलग माना है | गद्त्यि मुख्यतः भावोंका आदान-प्रदान है। वह विचार-जाणतिका विधायक,

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प्रणता है। इस अर्थमें वहनिष्प्राण, जविनसे भिन्न, असंबद्ध और विभक्त, अथवा वासना-सेवी कभी नहीं हो सकता |

साहित्यकी सीमाओं ओर जिम्मदारियोंकों भली भाँति पहिचानकर ही जैनेन्धने साहित्य लिखा है, यह कहना अयुक्त होगा उनके साहित्यमें सबसे प्रथम ओर विशेष गुण, उनकी मभाव-रम्य सहज वार्तालापशैलीके अतिरिक्त, उनकी विचार-प्रवर्तकता है। उनके विचारोपर चाहे जो आरोप हम करें, पर यह तो हम कदापि कह ही नहीं सकते कि वे पाठक या श्रोताके मनभे विचार-लहरियाँ नहीं उठाते उनकी लेखनीकी क्षमता इसीमें है कि वह विचारोंको ठेलती, कुरदेती और आगे बढ़ाती है | एक अच्छे छखकसे प्रामाणिकता और विचार-प्रब॑तकतासे अधिक कोई माँग करना भी भूल है। पश्चिमी साहित्य पढ़ पढ़ कर हमोरे दृष्टिकोण कुछ इस तरहकी एक खराबी पेदा हो गई है कि हम उसी साहित्यको ज्यादह उत्कट मानते हैं जो मत-प्रचारसे भाराक्रान्त हो | जैध अप्टन पिक्‍्लेंयर या ऐसे ही छछछलाती शेठी और भावोंके अन्य ग्रन्थकार | भारतीय आदर्श ऐसी भाव-विषमताके आवेशस पेदा हुए या नसेंमें ज्वार-उमार पेदा करनेवाले साहित्यस सर्वथा विभिन्न रहा है। हमारे यहाँ भावोंका विनिमय, विचार्रोका आदान-प्रदान, कभी एक दूसरेकी उत्तेजित करनेके लिए नहीं होता। वैसा लेखन या भाषण असम्य अनेतिक माना जाता था हम भारतमें साहित्यको शांति ओर संतोषके प्रसारका एकमेव साधन, रस-सूष्टिका प्रकार, मानते रहे हैं। जैनेन्द्रके छखोमे विचार-प्रवर्तकता है, विचारोत्तेजना नहीं

जैनेन्द्रका दूसरा विशेष गुण उनकी प्रश्नात्तरशील शेलछीमें है। वहीं जैनन्द्रकी वास्तविक सुल्झी हुई मानसिक प्रभुताके सच्चे दर्शन होते हैं व्यक्तिशः जैनेन्द्रकी विधारकताम मेरी आस्था ऐसे ही खूब निविड़ विवादोके बाद हुई है।वे विवाद शंका और सब प्रकारकी परिषध्यथितिकी अ्शान्तियोंके मध्यमें अडिंग रह सकते हैं, इसी गुणकों में कलाकारकी अमर साधनाका प्रतीक मानता हूँ जैनेन्द्र . आअविचलित रहनेवाले साहित्यकार हैं | इसीसे हम कहेंगे कि उनका साहित्यमाव विरलतरतसे विरकततम हाता जा रहा है

भाषा ओर शेलीसंबंधी बातेंपर जब हम आते हैं तब उनकी विशेषता बिल्कुठ साफ ओर अल्ग नजर जाती है वे माषाको कभी बनाने नहीं बैठते। ज्यादह बनावयका अथ्थ है बिगाड़ जैनेन्द्रका वेशिष्टय है कि उनकी अनसँवारी

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भाषामें भी उनके विचार अतिशय सेयतरूपमें प्रसूत होते हैं | क्योंकि वह अन सवारापन भावुकताके आधिक्यसे नहीं उपजा, ( जैसी उम्रकी शेछी ) और उसमें चुनोती-सी देती वह लापवांही है जो अंग्रेजी लेखकीकी नकलपर इधर लिखी जानेवाली हिन्दीकी कहानियोमें पाई जाती है। उसमें एक खास किस्मकी मृक्त प्राण 5ठशा-क्वाहते निश्चिन्तता, एक आत्म-विश्वासकी प्रफुछता, वनबाल्यको-सी स्वस्थ ओर चेताहर स्वच्छन्दता है। ओर भाषाके मामलेमें ज्यादह फिक्र सच- मुचम टीक नहीं, कथाकि वह लेखककों अतिरिक्त भावसे सचेष्ट और सचेत ०0॥520ए5 ) बना डालती है| यह अवस्था सहज स्फुरणके अनुकूल नहीं क्या लेखनमें और क्या जीवनमें, सहज होकर ही अपनेको दूसरेभ मिल्यया जा सकता है | बिना सहज-भावके तादात्म्य असंभव है। जैनेन्द्र भ.री उल्झनोंमेंसे इसी श्रद्धामय स्वाभाविकताके सहोरे बेदाग पार चले जाते हैं। यह लेखकके व्याक्तेत्चक लिए. आंतेशय महत्वशालक्य वस्तु है। यहा पाठकोके उपयोगाथ साहित्यविषयक टिप्पागियोंकी ओर इशारा आवश्यक होगा

दूसरी बात है अपरिग्रह स्व० प्रेमचंदके बाद, हिन्दीमें इतनी बहती हुई

५३ 2 6" ४०,

आर हृदयग्राह् शर्लक साथ हा साथ थाइन बहुत कह डालनंका खूबा जन

हद |

के] बी

कतिपय लेखकोमे हम देख पाते हैं उनमें जैनेन्द्रका स्थान विशेष है। जैनेन्द्रकी शैलीम निररथकताते बचनेका कितना सफल और सुन्दर आदश हम पाते हैं ! परिणामस्वरूप इधर उनके वाक्य विचारोंसे स्वचित भारी होने छगे हैं,--वे सूत्र बनने लगे हैं। यह गागरमें सागर भरनेकी संकेतात्मकता आजके लेखकम बहुत ही ज्यादह जरूरी मानी जाने लगी है, जब कि जमानेके पास समय थोड़ा _ बचा है ओर घन्धे (चाहे फिर वे स्वांग ही हा ) बहुत अधिक हो गये हैं ! सूचकता ( +59प22०४४ए७००४७ ) जैनेन्द्रके कई कहानीनुमा छेखाम ओर दो गद्य-काव्योंमें बहुत अधिक प्रमाणमें उपस्थित है। असलूम वह शेलीगत ही है उदाहरणके लिए. “जरूरी भेदामेद,' “कहानी नहीं, “दूर ओर पास,” राम-कथा' आदि उसमें तर्क करनेकी पद्धति भी इतनी मनोहारी है कि वह तार्किक नहीं लगती वह पाण्डित्यस आच्छन्न शैली नहीं है। वह संदेव ताजा, प्रसन्न, सादी ओर चलती हुई हिन्दुस्तानी लेखनशली है "

जनेन्द्रकी लेखन-शेलीकी तीसरी खासियत उसका घेरेदपन है | इस विशेषताका गोण बनाकर नहीं देखा जा सकता अक्सर मोौकोंपर ऐसे मोझजूँ मुहावरे हमें

श्‌०

मिलते हैं कि जिनकी मिसाल नहीं | बिलांद _, ' बिसात', 'झिल नहीं रही है अमाना आदि कई रोजमरके व्यवहारके शब्दोंके साथ ही जगह जगह

दाशनिक संज्ञाओंके लिए इतने सरल शब्द प्रयोजित हुए हैं कि देखते ही बनता है | कई नये शब्द जरूरतके वक्त मानें। आप ही आप बन गये हैं जिनसे हझेखकका भाषा-विषयक अधिकार व्यक्त होता है | अवश्य कई स्थलॉपर काफी रुर्बोध शब्दोंकी भी योजना हुईं है परन्तु वह मेरे विचार्स भाषाकी छाचारीकी बजहसे हुई है, लेखककी अक्षमता और आग्रहकी वजहसे नहीं। यथा ध्थान-स्थानपर अग्रजी शब्द-योजना

जनेन्द्रकी सहज भाषा गहन विचार ढाल देनेकी विशेषता, विनोदसे कहूँ तो, इस तुलनासे व्यक्त हो जायगी--जेसे एक ओर मेरी मातृभाषा हेनेसे १री इसी भूमिकाकी कृत्रिम किताबी हिन्दी और दूसरी ओर जैनेन्द्रकी 'नेहरू और उनकी कहानी _ की सरलातिसरल शैली | इसपर अब ज्यादह विचार करना भी दीके “जीवन की गहराईके नापकी अपेक्षा, पात्र और रुम्बाई चोड़ाईका बाह्य वेचार करनेके समान होगा जनेन्द्र ओर हिन्दीका भविष्य

आशय यह कि जनेन्द्रस हिन्दीको बहुत आशायें हैं। हों भी क्यों ! ननेन्द्रका पटनेका भाषण, जो इस संग्रहम हिन्दी ओर हिन्दुस्तान ' शीरष॑कसे [काशित है, इस दिद्यामें जेनेन्द्रके राष्ट्रभाषा-विषयक विचारोंका विधायक और

यावहारिक स्वरूप जतला सकता है। परन्तु इस पुस्तकके साथ जैनेन्द्रको, जिन्हें...

हेन्दी अबतक कहानीकार और उपन्यासकारके रूपमें जानती थी, एक अच्छे चन्तक, दार्शनिक ओर निबन्धकारके रूपमें पा सकती है। यह दागित्व तों हैन्दीके कंधोंपर है कि चाहे वह इस विचार-लोकके दझतिमान नक्षत्रको ( क्योंकि प्राखिर सत्ताईंस ही तो निबंध-लेख-गद्यकाव्यादि इस संग्रहमें ग्रथित हैं ) अपने

गरवका केन्द्र-बिन्दु समझकर समुचित स्थान दे, चाहे जैसे कई अन्य कछाकार हन्दीम॑ उपक्षित रह गये हैं, वेसे ही इसे भी अनंत शून्य ओर वैस्मातिके... क्षतेजम गिरकर विलीयमान हो जाने दे | इस बारेमें ज्यादद कुछ कहना हो

परी क्‍या सकता है!

तो मी, हिन्दाके लिए, जो मुझे ममता है, उसकी संपूर्णताके साथ मुझे कहने

घ्छ

दीजिए कि हमारे साहित्याकाशमे हिन्दीके भविष्योज्ज्वल सुवर्ण-कालके प्रभात-तारे झुतिमान होने लगे हैं। जैनेन्द्र उनमें शुक्र हैं। ये सब उस आनेवाले भाग्योदयके सूचक मंगल-चिह्न हैं। हिन्दी माताके सोभाग्यालंकारको अब हमें समझने ओर जाननेके लिए अधिक समय लगाना अशान नहीं, पाप माना जायगा। हिन्दी गद्य अब पुरातन परिपाटीकी सीमासे बाहर आकर निखरने छगा है, अपने पैरोंपर खड़े रहनेका पर्याप मौल्कि मनोबल उसमें अब आने छगा है और अब उसे आवध्यकता नहीं रही है कि बंगला या अग्रेजीकी जूँठनसे ही संतुष्ट रह उसपर युगकी चोट पड़ी है और उसे प्रस्तुत और श्ब॒ुद्ध होकर उस युगको प्रति-चोट देने जितनी क्षमता अपने बाहुआओँमें पाना है |

हिन्दी छेखक उस क्षमताकों विचार-ूक्ष्मता, संकल्पकी हृढ़ता, निरथथकके मोहका परित्याग, भाषाके संबंधर्म उदारता, आत्म-विश्वास और आत्म-सामथ्य- द्वार ही विकसित कर सकता है जैनेन्द्रमें इनमेैंस बहुत-सी चीजोंके बीज हैं। और मेरी इस भूमिकांस यह कदापि समझना होगा कि मेरा कथन जैनेन्द्रपर अन्तिम वाक्य है। लेनिनने कहद्या है, * अन्तिम कुछ नहीं है” ओर जीवित लेखक चिर-वर्धमान होता है। उसपर जो कुछ हम कहें वह मी 4ण०णातल्व अर्थौमें ही लेना चाहिए, क्योंकि साहित्यकार और सरित्यवाह एकसे हैं।

कुछ रव-गत

नदीका एक नाम है वेगवती | बहना उसके स्वभावंभ है। चद्दानें राहमें आवे, पर वह रुकावटपर नहीं रुकती वह अपने आप अपने ही समग्र जीवन- सामर्थ्यके साथ, अपनी दिशा खोज लेती है;।---उसमें समुद्रके विराट्‌ हृदयक साथ एकीकरण पानेकी तीत्र छगन रहती है। वह ऊपनी शैल-गुहासे ममताका नाता तोड़कर, पूरी गति और हार्दिकताके साथ सिर्फ बढ़ते जाना ही जानती है। राहम धूप ओर छायाकी बुनी जाढी उसे ढाँकती-खोलती, कंकड़-पत्थरके बिछोने ओर निश्र-बंधु उसका आमंत्रण करते, कटीली झांड़ियाँ उसकी धाराकी बाघा बन आती ओर बालूकी अपार शोषकता उसके सम्मुख विस्तृत उपेक्षा बनकर फैली रती है | तो भी नदी नदी है। नहीं है उसे परवाह इन दुनिया-भरके बन्धनोंकों | वह तो निःश्रेयलकी साधिका बनी उसी आकूल महासागरकी ओर बस प्रवहमान, गतिशीला है ७. ऑटक

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चिन्तक कल्शकारके मुक्त विचार भी ठीक ऐसे ही होते हैं वे सत्योन्मुख अमेदानुभूतिको चिस्तन-छाल्सासे अनुप्राणित, सजीव-सहज, निर्बंध-अखंड, सहिष्णु-उदार ओर वेगात्मक होते हैं।

ऊपरा ऊपरी दर्शक नदीका एक खंड देखकर कहता है, * ओह, कितना तरंग-तांडव, कितना अनियमित बिखरा-बिखरापन, जिसमें काई एक सूत्रता ही दीखे ! पर वह भूलता है थोड़ी-सी विचा[रपूर्वकताके साथ वह देखे तो पाये के “अरे, इसका प्राकृतिक प्रवेग तो देखो, इसकी सरछ-सहज सत्यप्रियता तो देखो ! इसकी रक्ष्योन्मुल्ी कातरता ही क्या इसके प्राणोंका सुसृत्न अर्थ नहीं £ अरे, इंसका नदीपन ही तो इसके अस्तित्वका नियम है ! यह लहरी-नंत्य नहीं, यह जीवन-मंथन है | *

जो मुक्त-विचार जीवनकी कीमत देकर पहिचाने जाते हैं उनकी ट्रेजेंडी यही है कि उन्हें कोई नहीं पहिचानता | वे अपरिचित,---अनएब्यूमिंग रहकर ही सुख पाते हैं। उनकी अपार आद्रता, उनका विश्व-वेदनाके साथ॑ हृदयशुन्धन क्वचित्‌ ही मर्भराकुल होता है। अधिकतर वह नीरब रहता है वे ऊर्ध्वगामी, निरन्तर मूक, आत्माकी व्यथा-गेद्स उठनेवाली, प्रश्न और विस्मय-चिह्रांकित पुकारें हैं .. और दुनिया जब इस पशोपेझमें ही पड़ी रहती है कि कोई समझे, हम तो नहीं

समझते, तभी मेरें जैसा कोई अल्प-कोशल हदृश्यांकनकार ( ८7 ,8॥082408

-एभां॥/९/ ) उस विचार-नदोके किनारों-किनारॉपर पर्यटन करके किसी एक: खंडकी लेकर प्रयास करने बेठ जाता है कि जिसमें नदीकी पूरी आत्माडी झलक वह अपने छोटेसे चित्र-खंडर्म प्रस्तुत कर दे उसमें वह अपने दृष्टि- कोणको शक्यतः विस्तृत ओर तठस्थ बनाकर नदी और नदीके आकाश-वातासको खींच लानेका प्रयत्न करता है।

जेनेन्द्रके इस लेख-संग्रहकी भूमिका लिखते समय मुझे अपनी ओरस इतनी- सी ही कैंफियत कहते या विज्ञप्ति, दे देनी है।

ऊपर सहजका समझानेका ओर निरभ्र आकाशकी अपार नीलम गहराईमें रंगच्छटायें खोजनेका किंवा नदीके तरंग-मेदमें परिव्याप्त एकमव जीवन-मेद * को चीहनेका असाध्य कर्म मैंने किया है |

इस प्रथम अयासमें मेने, हो सकता है, गलतियाँ भी की हैं। कई भूलें भी

श्र

रह गई होँ।। अनावश्यक विस्तार भी हो गया हो | परन्तु, मेरा अनभ्यस्त हृदय इस सबके लिए, हिन्दी-पाठकसे क्षमा माँग लेना चाहता है भूमिका जिन्हें अपूर्ण- सी छगे, उनके लिए विशेष अध्ययनके संदर्म रूपमें टिप्पणियाँ पीछे हैं ही | भूमिकाकी इस अन्तिम पंक्तियोमें मुझे एक तो श्री० ' अज्ञेय का आमार मानना है जिन्होंने कृपापूर्वक अपनी छ्लास्टरकी मूर्तिका छाया-चित्र इस संग्रहके लिए. भेज दिया | मित्रवर श्री, अ. गो. शेवडे एम. ए. की एक मेटका भी मैंने व्यम उठाया है। दूसरे प्रकाशक महोंदयकी भी धन्यवाद देना होगा जिन्होंने 'विशेषतः टिप्पणियाँ ओर संदर्भ-सूची आदिके बनानेम मेरी ओरसे होनेवाले अनावश्यक और अत्याधिक विलम्बकों आत्मीय भावस सहन कर लिया आर मुझे यह मोका दिया कि मैं जैनेन्द्रके बिखरे विचारोंकों कुछ आकार-प्रकार देकर हिन्दी जनताके सम्भुख रक्खूँ। अन्तंमे, शायद यह कहनेकी जरूरत होगी कि यह विचारोंकी पुस्तक है विचारपूर्वक ही यह पढ़ी जाय | यह भी कि विचार- शीलोद्वारा ही यह आलेचित हो तो अच्छा नहीं तो हिन्दीम, में देख रह हूँ, 'विचारके विषयमें पर्यात्त विचार नहीं किया जाता है। इस विषयमें सावधानी “रखनेके लिए मेरी सभी पाठकीसे विनय है |

उजञ्ञन

माधव कंलिज, + | १-६९ ९१-२७

“अभाकर माच्वे'

विषय-सूची साहित्य-विचार साहित्य कला--- ( लेख ) साहित्य क्या है !

विज्ञान ओर साहित्य साहित्य ओर समाज

कला क्या है ?

( भाषण ) साहित्य ओर साधना. (इन्दोर, १९३५) साहित्यकी सचाईं ( नागपुर, १९३६ ) जीवन ओर साहित्य... ( छाहौर, १९३६

( प्रश्नोत्तर ) साहित्यका जन्म

साहित्य, राष्ट्र और समाज रोटी मुख्य है या साहित्य

5

३६

६५

२० -

कम रैक २७

मी

साहित्य ओर नीति

साहित्य ओर धर्म

स्थायी ओर उच्च साहित्य ( पत्रांश )

कला ओर जीवन

'२ हिन्दी साहित्य आर आलोचना--

( छेख ) प्रेमचन्दजीकी कछा ( १९३१ )

आल्ेचक+% प्रति नेहरू और उनकी कहानी ( भाषण ) हिन्दी ओर हिन्दुस्तान ( मुजफ्फरपुर १९३७ ) ( प्रश्नोत्तर ) राष्ट्रभाषा 3 लेखक-विचार--- (लेख ) किसके लिए लिखें ? लेखकके प्रति (१९३३ ) ( प्रश्नात्तर ) . साहित्यसेबीका अहंमाव कहानी क्‍या ! (एक भेट ) ( पत्रांश ) ( विद्या के ) संपादकके प्रति (१९३४ ) अपने ही खातिर लिखना _ लिखना और आदर्श

२६३ २६८ श्र

२९१-९

९७ ४५

१०८

७२

२८८

४७ २९३ २९७

श्ण्‌

जावन-विचार समाज-धर्म-दशेन-- ( लेख ) आप क्‍या करते हैं ! १२२ कहानी नहीं १३४ रम-कथा १४ रे जरूरी भेदाभेद १५४ ( प्रश्नोत्तर ) अथ काम २८० सच्ची कमाई २८७ संस्क्रृति-दरशोन ( लेख ) उपयोगिता १७२ व्यवसायका सत्य १८९, प्रगति क्‍या ! २१३ ( प्रश्नोत्तर ) देश, काछ और संस्कृति २७७ शांति-प्रस्थापपा ओर कलहवृत्ति २८९ दर्शन--- ( ) आचार-नीति--- ( प्रश्नोत्तर ) अच्छा क्या, बुरा क्‍या £ जड़ सुख-दुधख २७६ आत्महत्या २८३ ( ) मानस-विज्ञान--- ( प्रश्नोत्तर )

बर्ताव-वादी मनेविज्ञान .. २७७

प्रेम और घुणा संकल्प, चिंतन ओर अनुभूति (३ ) अध्यात्म, तक--- ( लेख ) दूर और पास निरा अबुद्धिवाद मानवका सत्य सत्य, शिव, सुंदर ( प्रश्नोत्तर ) निर्मोह ओर अबुद्धिवाद सत्य परमात्मा आत्मा और परमात्मा

२७८ २८६

२०२ २११ २३६ २४५

२२२ २८४ रऐट८९ २०८

रश्छ

लेखककी अन्य रचनायें

परख ( उपन्यास ) १) त्यागपत्र ,, १।|) सुनीता » ३) तपोभूमि ,, २) एक प्रश्न ,,

वातायन ( कहानियाँ ) १॥) एक रात हर १।/ दो चिड़िया .,, १) फॉँसी ॥) स्पर्डा |)

राजकुमारका पर्यवन व्यवस्थापक--- हिन्दी-ग्रन्थ-रस्नाकर कायोरूय, हीराबाग, गिरगांव, बम्बई

साहित्य क्‍या हे ?

साहित्यकी सृष्टि ओर साहित्यकी आधुनिक पग्रगातिपर आलोचनात्मक विचार आरम्भ करें, इससे पहिले अच्छा होगा कि उस वारेकी अपनी जानकाराको हम स्पष्ट कर लें

* साहित्य क्या है? यह प्रश्न उठाकर हम आशा करें कि उत्तरमें वह परिभाषा पा सकेंगे जो प्रश्नके चारों खूँट घेर ले। परिभाषाका यह काम नहीं है। परिभाषा सहायक होती है, वह प्रश्नतनाचक चिहको सर्वथा मिटा नहीं देती परिमाषाद्वारा प्रश्ननाचक चिह्की मिटा देनेका यत्ञष हमें नहीं करना चाहिए यह समझ लेना चाहिए कि हमारे सब प्रकारके ज्ञानके आगे, और साथ, सदा प्रशनवाचक चिह्न चलता है हमारा कत्तैंग्य है के हम इस चिह्को ठेल कर आगेसे आगे बढ़ाते रहें | पर, यह भी हम करें कि उसे अपनी आँखोंकी ओट कभी होने दें। जब ऐसा

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होता है तभी आदमीमें कहर अन्धता (७72०९४7०) आती है और उसका विकास रुक जाता है

इस तरह, एक परिभाषा बनायें ओर उससे काम निकालकर सदा दूसरी बनानेको तैयार रहें | यह प्रगतिशील जीवनका लक्षण है ओर प्रगतिशील, अनुभूतिशील जीवनका लिपिबद्ध व्यक्तीकरण साहित्य है। इसीको यों कहें कि मनुष्यका ओर मनुष्य-जातिका भाषाबद्ध या अक्षर-व्यक्त ज्ञान साहित्य है।

पग्राशीमें नव बोधका उदय हुआ तसी उसमें यह अनुभूति भी उत्पन्न हुई कि “यह में हैँ” ओर “यह होष सब दुनिया है ! यह दुनिया बहुत बड़ी है,--इसका आर-पार नहीं है, ओर में अकेला हूँ। यह अनन्त है, में सीमित हूँ,--श्षुद्र हँँ। सूरज धूप फेंकता है जो मुझे जलाती है, हवा मुझे काटती है, पानी मुझे बहा ले जायगा और डुबा देगा, ये जानवर चारों ओर “खाँ खाऊँ? कर रहे हैं, धरती कैसी कैँटीली और कठोर है,--पर, में भी हूँ, ओर जीना चाहता हूँ।

बोधोदयके साथ ही प्राणीने शेष विश्वके प्रति इन्द्र, द्वित्म ओर विग्रहकी बृत्ति अपनेमे अनुभव की,---इससे ठक्कर लेकर में जीऊँगा, इसको मारकर खा दूँगा, यह अन्न है और मेरा भोज्य है; यह ओर भी जो